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साथ तेरे चली डगर

कहीं कुछ दूर मगर

याद कर वो एक सफ़र

मन मुस्कुराता है

🙂

धड़कन का शोर कभी

कभी ख़ामोश नज़र

बातें वो याद करे

सब्र मचल जाता है

मन मुस्कुराता है

🙂

बातों के कभी चले

ऐसे भी सिलसिले

दिन रात देखे ना

रोज़ झांक जाता है

मन मुस्कुराता है

🙂

देख रहीं आँखें,

कुछ और पर आए नज़र

मंजर वो राहों के

भूल कहाँ पता है

मन मुस्कुराता है

🙂

कैसे हम गुज़र चलें

हसरतों के क़ाफ़िले

अब तक ठहरा जो वहीं

दामन भिगाता है

मन मुस्कुराता है

🙂

कल देर रात गए ,

ज़िक्र कुछ और मगर

जाने किस बात से,

क्या ना याद आता है ….

मन मुस्कुराता है

मन मुस्कुराता है

🙂

हसरतों के क़ाफ़िले

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कुछ चाय की चुस्कियाँ , और एक तुम

समय का नशा था या उम्र का

चाय की चुस्कियों में स्वाद था

तुम, तुम्हारी बातें, तुम्हारे भाव

चीनी से घुला करते थे।


और मेरा चाय से नाता गहरा होने लगा ।

बेस्वाद चाय और तुम्हारी बातें ,


मेरे चेहरे पर मुस्कान और कुछ अनमोल जज्बात।

कैसे बेतकल्लुफ़ शब्दों में , हुबहू मुझे उकेर देते थे तुम …..

नशा चाय में है या तुममें मैं समझ नहीं पाता थी,

तुम ना होते तो तुम्हें सोचते सोचते

चाय को भूल ही जाती थी ,

जैसे मैं हर रोज बस एक ही

छोटी सी ज़िंदगी दोहराती थी ,


और चाय कभी ना पीने वाली मैं,

चियक्कड बनी जाती थी ।

तुम्हारे साथ चाय की चुस्कियाँ

और कुछ चकल्लस जिन्दगी की

“इससे बढ़िया कुछ ना पाऊँगी ।”


तुमसे मिलने से पहले कब पता था मुझे?

एक प्याली चाय एक जिन्दगी भी हो सकती है।


जीवन को इतने क़रीब से कब समझा था कभी ?

खास-दोस्ती तुमसे थी या चाय से –

मालूम नहीं।


तुम थे तो चाय चाय हुआ करती थी,

तुम नहीं हो तो अब भी चाय आदत भी है

नशा जैसी भी ।

और अक्सर ठंडी हो जाती है!


कुछ तुम्हारी बातों की गरमी नहीं,

और कुछ ठंडक तुम्हारी यादों की है ।”

समझ नहीं, मालूम नहीं, ख़ास चाय है या तुम ??

साथ तो आज भी है: चाय भी, तुम भी

उसको पीना मगर सजा सा है ।


वो ठंडी चाय जिसकी गर्माहट तुम थे

स्वाद जैसा तुम को ढूँढती हुँ ,

जो मुझ को मुझ जैसा देख सके

ऐसा तुम सा आइना ढूँढती हुँ

पर चाय बेस्वाद है, और तुम सामने नहीं

तुम्हारे होने से चाय में स्वाद था

बड़ी देर से ये एहसास हुआ ।

रोज़ अब चाय का कप लबों तक जाकर ठिठक जाता है,

जाने क्या सोच कर, फिर हलक में उतर जाता है –

तुम्हारे ख़यालों की गरमी लिए !

ये खास-दोस्ती भी बड़ी अजीब है,


एक कप चाय से आज तुम्हें लिख रही हूँ।

और फिर से मेरी चाय ठंडी हो गयी है


तुम्हें सोचते सोचते।

: सर्द रातों के रोज़ से ही एक प्रहर में

शायद किसी ११/११/२० को !!!!!-

ठण्डी चाय

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किस मोल तोल के सौदे में

क्यू कर ये मन फँस जाता है ?

मन कभी तो अखर जाता है

और कहीं निखर भी जाता है ।

.

रह रह कर फिर फिर क्यूँ अटका

किस आशा , किस भ्रम में भटका

किस किस रिश्ते को पाने में

रिश्तों के खोने का खटका !

.

क्या पाना सच में पाना है ?

क्या खोना सच में खोना है ?

ये मोह मोह के धागों में

नित का हँसना और रोना है ।

.

मन सम्भल कभी तो जाता है

और कभी मचल भी जाता है

कल जहां अखर मन जाता था ;

मन वहीं निखर अब जाता है !!!

निखार

Quote

आत्मा रूपी राम के, मन रूपी सीता को, अंहकार रूपी रावण के बन्धन से मुक्ति दिलाइए 😊

रामात्मा

मनसीता

जग अजुध्या

मोह रावण

मुक्ति मोक्ष

पा सकूँ

मने दीपावली

मन दीपावली

कर प्रसन्न

प्रेम अनंत !!!!

(PC Parul Tomar ji)

Thought for the day

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Dear You,

No

I don’t love you

Not anymore.

Though, I still

cling on

to each and every

memory of yours.

I still smile

at the fact

that you blushed

more than me

On all occasions

And how I

Tried pretence

to ignore you

in front of all,

when, in reality,

I would be dying to have

just one glimpse of you.

Oh! And, do you remember

those moments of solitude

you staring at me

And I swelling with pride.

I still re-read

the Whatsapp conversations ….

I always insisted

that I was a better writer

And you were my muse.

And you, you couldn’t help

but smile at my words.

And, today,

I still weep at night,

when I read out the letters

I had almost written to you,

loud in my mind,

realising that

I am still a better writer,

and you are still my muse.

So here,

I gather

my strength to scribble

A letter again

in your name,

saying that

after three long years,

I don’t love you anymore.

This is what I tell myself

Everyday .

But you know the truth,

don’t you?

🙂

So here I sit

Writing again

A letter

For you

A letter

To myself !

Muse

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दोस्ती की

परिभाषा नहीं मिली
बेहिसाब ढूँढा
गली गली
नुक्कड़ नुक्कड़
दूर दूर कोई आशा नहीं मिली

ना कोई फ़क़ीरा
जो समझा पाया
ना कोई वेद पुराण
से ही ज्ञान आया

बस यूँ ही
कभी भी,
कहीं से भी,
जो सोचा ना,
ना जाना था
जाने कैसे
वो अनजाना
कोई लेखक
कोई मदहोश
कोई वाचाल
कोई ख़ामोश
कोई हमदम
कोई जुदा सा
कोई मुझसा
कोई नया सा
रोज वाला
कभी कभी का
खेल से भरा
तो कोई संजीदा

कुछ चेहरे मिले,
कुछ लम्हे जुड़े,
कुछ यादें बनी
और कड़ियाँ जोड़ीं
तो वर्तिनि “दोस्ती” बनी!

एक से थे
मगर सभी वो
नाम जिनके
कभी भी लो
मुस्कुराते हुए ये दिल
कहे मुझसे
ये पल ……जी लो !!!!

जिस रिश्ते का नाम “ख़ुशी” है …..

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बहुत सिमटी सी दुनिया थी

बड़ा फैला लिया हमने

वो चेहरे चार जिगरी थे

उन्हें भुला दिया हमने

नए अनेकों इत्तिफ़ाक़

नए मुद्दों पे चर्चे अब

नए करने हैं कितने काम

रात-और- दिन का ढल जाना

नहीं फ़ुरसत कि सोचूँ अब

खोया क्या, क्या है पाना

जो ख़्वाबों में ना सोचा था

वो भी कर गुज़र जाना

आज इतने हुए मशगूल

ख़ुद को भी हैं खो बैठे

तेरे हिस्से के लम्हे चार

फिर भी रखते तनहां हम !

तनहा लम्हे

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आती और जाती लहरों पे
अक़्स तुम्हारा बनते देखा
बूँद बूँद तुम ऐसे बरसे
तुमको मोती बनते देखा

आते जाने कौन नगर से

जाते जाने कौन नगर को

पल ना रुकते लेकिन मिलके

दे जाते एक सीली रेखा

आँचल खींच पवन छेड़े है

यादों के लगते फेरे हैं

गिली आँख के कोरों में से

मुस्कानों ने झरना सीखा

क्या बादल ये कहने आए

बारिश ने मोती बरसाए

नयनों से और रूह से छू कर

फिरसे मैंने तुमको देखा

आती और जाती लहरों पे
अक़्स तुम्हारा बनते देखा
बूँद बूँद तुम ऐसे बरसे
तुमको मोती बनते देखा

मोती

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Jo beet gayi so baat gayi….

Par gayi kahaan?

Jag ke parde se uth kar ke
Man ke Aanchal mei chip kar ke
Reh gayi sadaa

Naani ki Jo ho Kahaani si
Kehne waale dete ho bhula
Sunne Wale ki smritiyon mei
Reh jaati Jo astitva Bana

Jaane kis kis baaton se Jag
Jaane kya phir phir yaad dila
Kabhi aanso se kabhi khushiyon se
Rakhti antar mehka mehka …

Jo beeti ya fir rooth gayi

Us baat ko kaise ham lein manaa

Gusse aur eham ke jhagde mei

Kahin rishte na ho jaayein juda …

Wo beeti to par baat Rahi !

Antar mehka mehka