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एक उधमसिंघ नाम का station

थोड़ा सूना, बेहद सुंदर

भोर किरण मैं उसको देखूँ

भीड़ से हट कुछ यूँ भी सोचूँ :

कितनी इसपे आतीं जातीं

छुक-छुक की आवाज़ लगाती

कुली-कुली की कुछ गुहारें

चाय-चाय की भी थीं पुकारें

बस एक दो ही आतीं जातीं

देखीं मैंने वहाँ लकीरें

कुछ passenger क़ो ले चलतीं

माल भरीं कुछ रहीं खिसकतीं

क्या इनके ही जैसी होती ?

एक वो जिसमें मैं हुँ बैठी ??

छुक-छुक की आवाज़ सुनी ना

कौन रंग ये भी देखी ना

समय सारणी भी ना इसकी

ना तो driver ना ही guard;

जाने किस engine से बंधकर

पल पल पीछे चलते चलते

पलों को पीकर

धुआँ बनाती

किस पटरी से किस पटरी पे

किस station से पैदा होकर

किस station पे जा थमने को

किस किस राहगीर को चढ़ाने

किस को राह में साथ निभाने

किस को बीच राह उतारती

किस को याद डोर बांधकर

किसको भूल मिटाते जाती

याद नहीं ये कभी रुकी क्या

कभी ईंधन के लिए झुकी क्या

किसी मोह में कभी बंधी क्या

या निर्मोही मोक्ष लिपी क्या

किस signal की भाषा सुनती

कौन chain खिचने से रुकती

उसमें कौन है गाना गाता

कौन भिखारी वाद्य बजाता

दिन कब चढ़ता , कब ढल जाता

मौसम, साल बदलते जाता

यौवन बचपन लुकझिपी कर

कैसे वृध हुआ है जाता

मेरे प्रश्नों के बचपन पे

आसमान से कौन हरि सम

अपलक देख रहा मुस्कराता

अंतहीन प्रश्नों को छलता

कभी हँसाता कभी रुलाता

आँख खुली तब से पाया ये :

चले जा रही –

जीवन रेल !

जीवन रेल

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जीवन के आकाश में ऊँची

आशाओं की पतंग

समय धार से गिरती, उड़ती

कैसी बहे तरंग

ज़ोर से थामो, खींचो , छोड़ो

डोर रखो मलंग

सपनों के आकाश में समरस

मन पतंग उत्तंग

: उत्तरायण का सूर्य शुभ हो

संक्रांति की पतंग दबंग, उन्नत, मदमस्त हो !

उत्तरायण २०२०

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कुछ तस्वीरें किसी के कहने पे उतारी

चंद पंक्तियाँ किसी और पे वारीं

कहीं ख़ुशियाँ बिखेरीं

तो कहीं आंसुओं पे चादर डालीं

लम्हों लम्हों में ढूँढते , जीते

कुछ पल अपने लिए,

तो कुछ सबके लिए

कभी हल्की फुलकी सी,

तो कभी ज़िंदगी लगी भारी

कभी गुनगुनी धूप

तो कभी छायी बदरी कारी

कभी boss की डाँट सी

तो कभी बच्चे की किलकारी

कितने रंग, कितने चेहरों से

सजे दिलों की दीवार हमारी!

इस वर्ष, उस वर्ष,

आने वाला ,

जाने वाला,

ना वो कम था

ना ये कम होगा,

ना तब रुक वक़्त

ना ही अब थमेगा

आते जाते पलों पे

जिजीविषा की छाप

२०२० को सिंचित करे

फिर नवीन उल्लास!

२०१८ से २०२० में उतरते …..

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पलकों के पर्दे में छिपाया है दुनिया से तुम्हें

कैसे नज़रें उठा के देखें जहां को अब

.

होठों के गीतों में बसाया है तुमको

कैसे तोड़ दें चुप के पहरे अब !

.

.

.

२७/१२/१९

– बेसाख़्ता !

सुबह सुबह की कलम की खिच खिच

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At the mesaage beep

A memory pops up

And the fingers move

Effortlessly

To get in touch

No, the message was not

From the one to whom I write

But that says so much

Of where the thoughts

Reside…

And the heart skips a beat

Like a teenaged love

As a curve dangles and dance

Moving the lips to call-

Your name!

The screen seen by none

And the screen yet so wide

Oh! Its is me on the screen

So Leisurely I lay,

Watching the movie play!

Some memories, few dreams,

Dash of imaginary frills

Placed high-on cloud nine

A small world of mine

Wonder-I call so

And while no one ever saw

There I lived to my tunes

Till the day i opened

Dont know why and how to you

A tiny window…….

From Archives

2014

A tiny window

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ख़ज़ाना

https://anutoolika.wordpress.com/2016/08/02/%e0%a4%96%e0%a4%bc%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be/
— Read on anutoolika.wordpress.com/2016/08/02/ख़ज़ाना/

सोच लिया अब तुमको दे दूँ

कहाँ संजो पाऊँगी

क्यूँ अब इनको रोज़ बिछा कर

यादें दुलराऊँगी

कभी अधूरे थे तुम लगते

मन में छाये जब थे

पूरा सा अब तुमको पाती

रूह समाए रहते !

ख़ज़ाना

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याद है ?

वो पेड़ पे नाम उकेरते लोगों की

कितना आलोचना करते थे ।

और शाम की लम्बी-लम्बी सैर में

दुनिया को बदलने के हौसले भरते थे ।

वो गीत और ग़ज़ल गाते गुनगुनाते

कितनी कविताएँ रचते थे ।

और पत्थर पे रंग बिरंगे

अनेकों सपने रंगते थे ।

*

बचपना ही तो था

ख़ुद को मगर कम ना समझते थे ।

और हाँ , हा-हा-हा-हा…

कितना खुल के हंसते थे ।

साल बारहवें में जब मिले थे

क्या पता था यूँ घुल जाएँगे ।

और रास्ते जो बँटे तो ना सोचा

क्या फिर एक दिन मिल पाएँगे ।

*

बचपना ही तो था

बिना मोहब्बत के तकिया भिगोते थे ।

लम्बे-लम्बे पत्रों में

नित नए ख़्वाब संजोते थे ।

वो किताबों की आदर्शवादिता

कैसे लहु में बसते चली गयी –

और छोटी सी वो लड़कियाँ

पता ना चला कब प्रौढ़ा बन गयीं ।

*

कुछ वर्षों पहले कई साल बाद मिले

बड़ी भागी- भागी सी मुलाक़ात थी।

शादी, बच्चे, पुरानी यादों के बीच,

ताले से झांकती सपनों की तादाद थी ।

कहाँ बातें पूरी हो पायीं थी-

कितने सिरे छूटे रह गए थे ।

तब और अब में फ़र्क़ कैसा?

सिलसिले अब भी अधूरे से ही थे।

*

चाँदनी खिलती बालों में

आँखों की चमक सीली सीली सी थी।

तुम अब भी वो ही बच्ची सी लगी

संग तेरे फिर वो दिन मैं भी जी ही ली थी।

कितने ही फ़लसफ़े कहे और सुने

कितने ही क़िस्से बातों में बुने

“बस यही एक पल है गुज़र जाए ना”

सोच ये हर हसरत पूरी सी कर ही ली ।

*

वक़्त बहता चला, कुछ मगर चाल यूँ

दम भर में दिखा. और ओझल हुआ ।

दूर बैठीं हैं जो, पेड़ के नीचे दो

वो सहेलियाँ ही हैं, या परछाइयाँ?

फ़लसफ़े बुन रहीं, उम्र में ढल रहीं

उम्र पकती में और, बचपना भर रहीं,

थपथपा पीठ , कर हौसलों को बुलंद

जैसे कहतीं हो हँस के किसी लम्हे को-

भागते तुम रहे, और डटे हम रहे

लम्हे लम्हे में उमरों को जीते रहें

एक पल ही सही, कोई कम तो नहीं,

फिर मिलेंगे किसी दिन, ये वादा रहा !

फिर एक दिन मिलेंगे