Category Archives: Love

आहटें

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खुशनुमा सा लगे समां क्यों है
किसके क़दमों की आहटें आतीं
चाँद पूनम का रात शबनम सी
साँस फिर एक ज्यों ग़ज़ल गाती

टुकड़ियाँ

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जो शब्-ओ-शाम ही देखा तुम्हे करतें रहतीं
वो निगाहें देखने को तुम्हे पल पल तरसें

हुई मुद्दत ना हुई तुमसे कोई बात, मुलाक़ात
रोज़ ही तुमसे मिलें हैं, रोज़ ही बात करें

भूल तुमको गयें हो ये तो गंवारा ही नहीं
याद करते नहीं गोया की याद तुम भी करो

ख्वाइशें और भी हैं जो ना जुबां बोल सके
बंद आँखें जो करो, फिर मेरी नज़रें पढ़ लो

देखते रहते हैं मुड़के कि जहां तुम थे खड़े
फिर पुकारा करें तुमको याद मर मर के जीये

चले जाता है आज थामे हुए हाथ तेरा
कभी एक वक़्त सुकूं था बसा बस दिल में मेरे

कहे से और भी बढ़ती चली जाती है खलिश
कभी जाना भी हो तो अलविदा ना कहना हमें!

कई दिन की उदासियाँ उम्मीदें कर रहीं रौशन
थकी जातीं थीं नज़रें, शुक्र-ए-रब, दीदार तो होगा !

हमें भूल के तुम रह पाओगे क्या
कि बातों में मेरे फ़साने चलेंगे

लबों पे आज तालें हैं
निगाहें बंद पर्दे में
फिर भी हैं सिलसिले
गुपचुप झाँकने के,गुफ्तगू के

बड़ा गुरूर है खुदपे तुमको
जवाब हर गुरूर का हूँ मैं !!

न देखूं तुमको तो दिन कुछ अधूरा ही सा लगता है
जो देखूं भी, मगर पूरा सा तो होता नहीं लेकिन !

थोड़ी सी ख़ता की इज़ाज़त जो बक्शी है
बेहिसाब नेयमातें इस ख़ता में बसतीं हैं

काश नाराज़गी ही होती इस बेरुखी पे
बात करते नहीं लेकिन, बात करते भी तो हो

हसरतें यूँ भी कभी खेल किया करती है
चाह ये भी कि मयस्सर हो कोई बात करो तुम!

मदहोशियाँ भी, होश भी बहके ना मगर
जाम पे जाम यूँ नज़रों से पिलाओ हमें तुम

क़त्ल होना किसे कहते हैं जाना ये क़त्ल होके
बेबसी के सभी आलम देखते हैं रोज़ जी के

कहीं दीदार की चाहत, कहीं है यार से निसबत
जिधर देखो किसी ताबीज़ से कुछ हसरतें पलतीं !!!!!!

बड़ी बेअदबी से दे डाला तमगा बेसउर का
ये तो कुछ भी नही, हम जाम-ए-जिंदगी पे रखते होठ !

लफ़्ज़ों को बाँध पाये
कब इतनी कुवत हममें
जब भी हुए अकेले
कुछ शब्द बने साथी !

गुज़र रहे थे यूँ ही हम पुरानी राहों से
चंद चेहरे पुराने देख के गुलज़ार हुआ दिल !
इन्ही की सोहबात में कई बदमाशियां सीखी
इन्ही की गालियों में गूंजते  ठहाके गले मिल

जान लेके किसी की जिंदगी पायी जो अगर
जान क्या ख़ाक कभी फक्र से जी पायेगी !

जिसे देखा निगाहें मूँद के, दिल से सुना किया
उनके परदे में होने से भला हमको फरक कैसा !!!!

तमाम बचपन भागते समझ के पीछे रहे
जिंदगी की समझ आई तो बचपन याद आता है

कभी नाराज़ होने की तमन्ना जब भी उठती है
सिहर जाते है कि गर ना मनाया तुमने, क्या होगा !

बड़ा सुकून है आज की इस बेकरारी में
कि अश्क़ भी है, मुस्कराहट भी खुमारी में

बात सबसे किया करते, खफा एक हमसे ही हैं
दोस्ती उनके निभाने का हुनर अच्छा है !

तुमने कब खायी थीं क़समें कोई;
कभी वादे ना किये ।
तुमसे शिकवा ना शिकायत कोई-
हम ही दुनिया में तेरी, बिन इज़ाज़त के जिए!

गुस्सा भी है, गुरूर भी
कुछ आप ले नहीं पाये
कुछ आप ही ने दिया भी !!

ख़राश

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कुछ आवाज़ में आज फिर ख़राश थी ;
किसी आरज़ू में दबी सी वो रात थी !

तुम ठहर गए कहीं देखते हमें-
आँख मूंदे बेखबर चलते हम रहे।
उस बेखबरी में भी क्या खिलाफात थी?
तेरी ही पनाह ने ये नेयमात दी!

और खुद ही तुम खफा बख्श कर हमें!
हम समझ सके ना कुछ, सिसकते रहे।
अपनी ही नासमझी ने कब मियाद दी?
बार बार ठोकरें राह में लगीं !

खौफ ज़दा अब है दिल, ख्वाब से बचे।
और ख्वाब में ही मगर जागते हुए-
एक बार खुदही से फिर जंग ठान ली !
एक बार ढूँढने खुद को फिर चली !!

किसी ख्वाब में तुम्हे गूंथ लूँ

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किसी ख्वाब में तुम्हे गूंथ लूँ
किसी ओढ़नी में मैं टांक लूँ
यूँ ही चलते चलते कभी कभी
तेरी ओर मुड़के मैं झाँक लूँ

मैं जहाँ का चाहे भी रुख करूँ
तेरी खुशबुएँ मेरे साथ हों
तेरी नज़रें साथ रहे मेरे
तेरे गम-औ-ख़ुशी को मैं भांप लूँ

कभी थे अधूरे जो फ़लसफ़े
वो पनाह तेरी लिया करें
तुझे भर के अपनी बाहों में
मैं दो जहां को नाप लूँ

कुछ कहते कहते रुके कभी
कुछ बोल के भी ना कह सके
फिर भी जो तुमने सुना किया
मैं ना कह के तुमसे कहा करूँ

कभी चांदनी में बिखेर के
कभी दिन उजाले की बात के
कभी बादलों सी उड़ी फिरूँ
कभी झिलमिलाती सी रात हूँ

कई किस्से हमसे बना किये
कई लम्हे तुमपे फना किये
एक नगमा बन के जो बह चले
तेरी धड़कनों का वो राज़ हूँ

किसी ख्वाब में तुम्हे गूंथ लूँ
किसी ओढ़नी में मैं टांक लूँ

किसी ख्वाब में तुम्हे गूंथ लूँ
किसी ओढ़नी में मैं टांक लूँ

इतनी सी बदमिज़ाज़ी

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प्याले में कहाँ आ सके
बोतल शराब की
आँखों में देखते रहे
और डालते गए!

अरसे के तलबगार हैं
ये प्यास बुझे ना
बारिश बड़ी नमकीन है
ज़ज़्बात भर गए!

हर्फों का खेल ही तो था
खामोशी ने खेला
नज़रों की खताओं से
सौ गुनाह कर गए!

ना नाम के थे मोहताज़
ना ही ताज के
कुछ कहते कहते रुक गए
हँस के गुज़र गए!

एक लम्हा था रुक कहीं
हाथ छुड़ा के
इतनी सी बदमिजाजी थी
अफ़साने बन गए!

अधूरी सारी बातें

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रात आधा चाँद मुझको ताकता है
और आधा जाम आँखों में घुला है

बोल आधे ही घुले से बात में हैं
नैन आधे ही खुले, कुछ ख्वाब में हैं

चल दिए कुछ दूर तक धीरे से बादल
और आधी दूर जाके क्यों रुके हैं

रात रानी की महक आधी उड़ी सी
और कुछ फूलों में बस के रह गयी सी

थाम के तुम चल रहे हो हाथ मेरा
सब अधूरा, पूरा बस एक साथ तेरा!

है बड़ी ही खूबसूरत सी, अधूरी सारी बातें
रह रहीं हैं संग हमारे, गुन गुन गुनगुनाते-

चाँद मेरी खिड़की में से झांकता सा
बादलों का जिसपे पर्दा सा गिरा है

रात रानी खुशबुएँ बिखेरती सी
गुलदान में खड़ी शरमा रही सी

रोज़ ही एक ख्वाब बनता है कहीं पे
हाथ तेरे ख्वाब मेरे पालते हैं

है बड़ी ही खूबसूरत सी, अधूरी सारी बातें
रह रहीं हैं संग हमारे, गुन गुन गुनगुनाते

थाम के तुम चल रहे हो हाथ मेरा
सब अधूरा, पूरा बस एक साथ तेरा!!!

लत

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जो उतर रही हलक से
हो करीब तेरे लब के
वो जला रही मुझे है
मेरी रूह पे हैं छाले

कहीं दूर थाम खड़े तुम
कई जाम खनखनाते
मेरे कानो में अनायास
ज्यो बिखर रहे हैं प्याले

जो मैं हाथ थाम पाती
तेरे मन को भरमाती
तो नशा नज़र का होता
बेज़ुबानी गाती तराने

कभी हार मान जायें
कभी कोशिशें जुटायें
ये दिल अजब है वहशी
किस्मत के दाँव डाले

नाराज़गी भी तुमसे
मुस्कान भी, कसम से!
कभी छोड़ना ना ये दामन
या रब, कसम ये उठा ले ।

ये ही “शब्द” गूंजते हैं
होनी को गूंथते हैं
इनकार कर ना; तू डर ना
मेरे सुर से सुर तू मिला ले ।।

ख्वाब पागल ये

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सुबह अंगड़ाई सा उगता
बिखेरे बाँह किरणों की
नज़र पड़ते ही मुझपे
दौड़ के भर लेता बाहों में
और तब तक गुद्गुगाता
ना खोलूँ आँख मैं जबतक
ये सूरज रोज़ ही आके चुराता
मुझको ख़्वाबों से ..

बड़ा ज़िद्दी है पागल मन
हाथ थामे रहे दिनभर
चढ़ाता सर पे दोपहर
शाम बाहें कमर डाले
और हौले सुला देता
रात ओढ़ा के फिर चादर
आँख फिर से चमक उठती
जो चलती मिलने ख़्वाबों से।

ख्वाब भी कितने शर्मीले
नज़र दिन से चुराते हैं
रात चँदा के आँचल में
बंधे मन को लुभाते हैं
कभी बादल में उड़ते तो
कभी तारों में बस जाते-
तेरे नयनों के कुछ सपने
मिले कल मेरे ख़्वाबों से ।

तभी से ख्वाब जो थे
कल तलक पूरे ही मेरे से
आज आधे है तेरे
और हैं मेरे अधूरे से
कभी आँखों में मेरी झांकते
नींदें उड़ा देते
कभी पलकों में तेरी जा रुकें
तुझको भी तंग करते
रोज़ इनको भगाती हूँ
रोज़ मुझको सताते हैं
खता तुमसे करें तो माफ़ करना
ख्वाब पागल ये !!

The fall

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I fall in love
Everytime I know you
A little more each day
A lot more each year
Falling in love
With your strengths
Falling in love
With your imperfections
Falling in love
For your loving me
Falling in love
“Even when I didnt”
For its not I care
How the world paints you
Or how you show yourself off
I care for the glimpses
Of human I see
Sneaking out from the
Most unnoticed of you
I care for the warmth
That you effortlessly extend
To one and all
Unconditionally
And little did u realize??
How each time
I fall for the smile
I fall for the glance
I fall for the embrace
I fall for the surprises
I fall and I fall….
I fall for YOU !