Monthly Archives: February 2014

Aadyut :)

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इठलाता भोला  सा बचपन
पल में हँसता , पल में रोता,
क्षण भर में रूठ मुह फेरे 
बाट जोतता कोई मना ले ….
 
भाषा भोतेरी सीख के भी 
सबसे मुखर चुप की बोली 
शब्दों के बंधन से आगे –
बैन न डोले, आँख से बोले, 
 
जो भी पढ़ ले, आगे बढ़ के 
जो इनका आलिंगन कर ले 
मनमोहन के मन-उपवन में  
सम सखा कर ले वो फेरे ….
 
कितना हठ है बाल सुलभ यह 
जो कह लो पर “आप” ही हारे 
विजय पताका फीकी लागे 
एक मीठी मुस्कान के आगे 

Dhand, Baarish aur Kohra

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दमकते सूर्य की तपिश को बाहों में समेटा है
 चढ़े दिन में भी होता छिप रही संध्या का धोखा है
ये बादल तो नहीं की अपने दम से दिन को भरमा दे
ज़रूर बूंदों की चाहत ने मन सूरज का रोका है

नादान सोचता है कोहरे में खुद को  छुपा के
चाँद लम्हे बिता दे आज बारिश के आलिंगन में 
दे के बदरी को रिश्वत की वोह सघन रूप में रह ले
और खुश हो ले पा के ताज सूरज को हराने का!!

The volcano : in the two cores !

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तोड़ चट्टानें बह जाने को फिर लावा उफनता है 
ठिठकता ना ठुनकता ना , बस अब विद्रोह करता है 
जाने किस पीर की अग्नि छाती धरती की सुलगाती
की अपने ही जाये को भस्म करने को उफान आती
वोह दामन जो बिखेरे फूल, झरने, पाव तले ठौर
बिगड़ जाये ना जाने कब; छीन ले साँसों का भी दौर

वोही ज्वालामुखी एक इस सीने में सुलगता है
वोही लावा का दरिया धडकनों के संग रहता है
ना जाने कैसा बंधन है , अजब अनमोल रिश्ता है
की एक उबलता रहता है और एक शीतल समुन्दर है
एक माने दीवारें सर नवा, जग ने जो दी  उठा
सभी बेडी जो पायल नाम दे  पाव पर दी सजा
और दूजा मचल जाता है मन की बात रखने को 
अपनी ही धुन की करने को अपनी ही राह चलने को…….

Aside

मेरे दो नैनो से पढ़  लो

तेरे दो नैनो कि बोली 
जीवन कि संपूर्ण कहानी
इनमे  करती आंखमिचोली
 
अजब अनूठी इनकी भाषा
खट्टी,मीठी,कुछ-कुछ झूठी;
पलकों के परदे के पीछे 
सपनो और सच की रंगोली
 
          इन्द्रधनुष सी चुनर  ओढ़े  
          धूप, कभी बदरी में खेले
          कभी कोर से हंसी झांकती
          कभी छलक जाते दो नैना
 

          रोको ना इन मतवालों को 
         जब मचलें ये हाथ छुड़ा के 
          ना डालो इन पे चादर जब
         उफन उठे मदमस्त ये नैना

मेरे इन नैनो में बसते
तेरे ही ख़्वाबों के फेरे
खुली पालक या बंद नयन हो
भरी धुप और रात अँधेरे

कब का खोया खुद को मैंने
हर पल तुझको ही पाने में
अब तो मेरे भी ख़्वाबों के
तेरे दो नैना हैं चितेरे

जब खुल के विस्तृत होते हैं
दो कोपल तेरे अधरों के
मुस्काते हैं उसी झरोखे में
ख्वाब मेरे रंग बिखेरे

फिर भी जाने क्यों ना माने
तेरे नैना मुझे ना जाने
बार बार पूछा करते हैं
खुश तो हो ना तुम संग मेरे

हँस देते हैं पागल नैना
छलक छलक के ढुनक ढुनक के
धोकर कलुष जगत के सारे
फिर तुझ संग नव लेते फेरे !!

rainbow

pakoda party

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फिर मत कहना याद नही किया

हमने हर चाय की चुस्की में आपका नाम लिया

बेसन के घोल में प्याज आलू को लिपटाया

और हर टुकड़े पे आपका ख्याल आया

गोभी के फूल ने भी मुस्कुराया

आपकी फरमाइश है जब ये बताया

कढाई के खुलते तेल में फिसलती

हर पकोड़ी छन्न छन्न  चिल्लाई

आपको पर कुछ ना दिया सुनाई

गरमा गरम से ठन्डे होने के सफ़र में मुरझाई

मिर्च की तीखी चटनी भी प्लेट में पड़ी पड़ी उकताई

आपकी बेरुखी की दास्तान सबने गाई

अब ना कहना हमने पकोड़ी नहीं खिलाई।।

Eternity

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the words pledge to give up the throne

and let silence rule alone
the kingdom once mutually shared
and stepping down, the words stop! ask-
 
will you, o silence, still stand by me?
your ears still hear what i no more say…
without a glance , will your eyes see me…
will your heads turn, still seeking me??
 
and silently thou raise up your eyes
that words may fail but silence never
so the “unspoken” said would last forever
and the eyes not glancing keep watching forever…
 
so dearest of dears, thou may exit
but your very being stays right here
and though we now walk different paths,
thy kingdom lives to ETERNITY!!

Deodaar

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सिर उठाये 

आसमान को छूते देओदार
और क़दमों में उनके
सजदा करते
बादलों के नन्हे टुकड़े 
बिखरे
 
उठ उठ बार बार बढ़ते
उनसे कंधा मिलाने
सिर उठाने
फिर फिर फिसल जाते
धरती पे आकर
 
एक नन्हे बालक सा मचलते
उछलते 
अह्ह्ह
क्या मोहक खेल यह
बादलों का पेड़ से
 
और धरती प्रफुल्लित
क्रीडा पे न्योछावर
करती है मोती
अनगिन और अनुपम
फूलों का विस्तृत
मादक यौवन
 
फलित हर डाली
झुकती धरती पर
हँसती और कहती
उठ लो ए बादल
मुझसे भी ऊपर
आगे को बढ़कर
 
वाह अब ना चूके
गर्वित हो बदरी
चढ़ती काँधे से
ऊपर और ऊपर
घन और घनघोर 
सूरज के आगे
छाए अम्बर पर
रैना दिन करदे
 
हँसती फिर धरती
झूमे है पल्लव
की अब थक कर जब
बदरी  उतरेगी
बूंदे बरसाती
जग को नहलाती
सोंधी  खुशबू से 
सब को महकाती
 
फिर ढल जायेगी
कांधे से नीचे
फिर लहराएगी
कदमो पे आके
 
पर वो क्षणभंगुर 
विजयी सिंघसान
ही तो है उद्गम
जीवन में जल का
 
फिर देओदार 
सिर को उठाये
अवनी से सिंचित
अम्बर पे छाए
 
अपने आँचल में
बदरी झुलाते
फिर नन्हे टुकड़े 
गोदी खिलाते

Dil-e-nadaan ?!

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kab sune kabhi ye logon ki…

 logon ki kya , meri bhi nhi!

 madmast , madhosh,rasik, chaliya,
nadan naa kaho; dil dusht badaa!!
 
 
chori chupke kab kuch hai kiya?

jab jo chaha; lad lad ke liya

nazuk hi samajhti thi isko
bizuri saa tez; prakhar niklaa!
 
 
har raah, mod pe thaam chalaa
apne jaisi kuch dhadkan ko
rishton ke jame naye naye
pehne dhumke; itraata saa….
 
issey hai rashk mujhe hota
 masti ye mujhe jo mile zara
 mai bhi kuch pal man se jee lun
 khul kar mai bhi has lun thodaa!
 
 taj dun mai wo jo raas nhi
 le lun sab wo jo man bhaaye
 apne se hi saathi sab ho
 ek duniya apni lun mai basaa!!