Monthly Archives: January 2015

धूमिल राहें

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तुम चले जाते कहाँ?
हज़ार बहानों से
लाख पुकार तुमको..

ना देखा मुड़के कभी
फिर भी देखा किये
छुप छुप के हमें

कितनी गर्मी तेरी निगाहों में
पीठ सिक जाती है
रह रह के मेरी

और तुम सोचते हो
हमको खबर ना होगी?
कितने मासूम हो तुम !

हम थे पर्दानशीं
और तुमने किया था पर्दा
वक़्त ने खूब है माखौल किया

तुमने तो सर नावां
कबूल किया हर सजदा
हम ही हठ कर बैठे

चले जाते हो तुम
जो राह तुम्हे पायी है
हमको भी साथ लिए

कहते हो ये मगर
तुम जाओ अपनी डगर
मुड़ के ना देखेंगे

गूंजते है वक़्त के ठहाके
तेरी मेरी किस्मत पे
रोज़  रुलाते हैं

राह अपनी ही चले हम तुम
क्यों ठिठक जाते हैं-
पीठ सिक जाती है

पीठ सिक जाती है
तेरी भी मेरी भी अक्सर
कितना याद आते हो

अरसों गुज़रे हो ज्यो
दिखते भी नही
कितने तुम दूर गए

कितनी आवाज़ें दी
तुमको हमने
तुम चले जाते हो…………..

अधूरी खूबसूरती

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दाग दिखते हैं पूरे चाँद पर
दुनिया की आँखों को
अधूरा चंद्रमा पाता
ताज-ए-दिलकशी हरदम

जो पूरा हो गया सपना
वो खो बैठा खासियत जल्द
अधूरे ख्वाब खुशबू की तरह
दिल में महकते हैं

जो है आधा अधूरा
प्यार से उसको संजोये तुम
यूँही बस याद में रखना
लकीरों में ना खो जाना ।

Padhai

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कहते ग्यानी पढना लिखना
तुम्हे बनाते बड़ा
हाय, हमें तो मगर पढाई
बना रही है गधा …..
रोज़ सवेरे सौ मन का
बस्ता कांधे पर लादे
नींद भरी आखों से हम
घर से स्कूल को भागे
दिन भर गणित, हिंदी, अंग्रेजी
का हम करते जाप..
रटते वोह ही सीख नहीं पाते
जीवन का पाठ!
घर आते हो जाती शाम
खेल बहुत लुभाते;
पर होमवर्क के आगे उनके
सपने ही रह जाते!!

काश हम उस युग में आते
जब बच्चे होते बच्चे;
पत्थर, पड़ों पर खेल कर
पाठ सीखते सच्चे….

जुटे हुए हैं समय चक्र में,
समय कल पहले रहे बुढा;
सच मानो तो आज पढाई
हमें बाना रही है गधा!!!

waqt

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वक़्त तो यूँ कतराता है हम से
जैसे बरसों की उधारी चुकानी हो उसे
और हम मिल गए तो मांग लेंगे….
पर लड़ लेते है वक़्त से भी हम
कुछ कुछ अपने लिए;
और कुछ कुछ तुम्हारे लिए

हाथ छिल से गए है इसी रस्साकशी में
याद करते है तुमको और दिन बितातें हैं
तुमको है शिकायत कि नही वक़्त तुम्हे देते हम
हम तुम ही तुम में रहकर जिए जाते हैं

पुकार

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गुस्से से मन कतराता है
दो बोल जहाँ मीठे बरसे
मन खिचा वही पे जाता है

आऊँ कैसे उस उष्म डगर
जिसको सेके गुस्से का कहर
जब चाँद तले ये भाव ढलें
और नेह आपके प्रेम पढ़ें
तब मुस्का के लेना पुकार
आ पहुचेगे हम प्रेम द्वार ।।।

कारवां

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हम अकेले ही चले थे
लोग जुड़ते चल दिए
राह मुश्किल क्या रहे
जब कारवां बढ़ता गया…..

जुटते लोगों के सुरों की
आदतें होती गयीं
शोर भी उम्दा लगे अब
भीड़ भी आगोश सी

चल ना देना राह से हट
मोड़ जो कोई मिले
हो अनेकों लोग लेकिन
आदतें “हर एक” की

Witches

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Witches…
They hail
In the dark of night
And in me
Out of sight.
Making me
Not me
Shaking all 
Idols of mine
Grining everytime
For my weakness
That makes them
Ever strong!
And day by day as i fight
I succumb to their existence
I surrender to the cracks
Developing in my strengths….

Shikayatein

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Kiski karein shikaayat
Aur kisko??
Yahan khata kaun kare
Jag ko hai maaloom magar
Ek dil hi banaa maasoom
Roothta khud se…
Khud ko manaa bhi leta!
Aahatein ginta kabhi
Khol kewaarein jhankein
Aur phir kehta hai moond aankhein…..
Jao mai naa tum se bolun
Ab naa koi raaj kholun
Gair ho tum, –
kisi haq se naa pukaaro mujhko
Aaj ho saath khade
Kal door chal doge
Phir kisi chot ka nasoor
Dil mei bhar doge
Jao tum aaj hi chip
Chaand jaise baadal mei
Aur jab barsenge baadal ye
Hum bhi bhegenge
Jaise bhar ke humei
aagosh mei tum-
Tab bhi keh rhe ho,
“Jaoge hum se door kahan” !!!!

नयी जिल्द की डायरी

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एक नयी जिल्द की डायरी
किताबों की भीड़ के बीच से
रोज़ ताकती है मुझे

सुनहरे वर्क की चमक
मन लुभाती सी
और कोरे पन्ने बुलाते मुझको….
कैसे रोकूँ उन्हें

मचल जाते है हर्फ़ सब
जो अनकही से बने
सियाही है बड़ी बेकल
वहां बिखर के चले….

मेरी कलम से आशिकी है उसे
और मेरी कलम को उससे
ना जाने कौन वक़्त का पहरेदार
रोकता है उन्हें

एक नयी जिल्द की डायरी
किताबों की भीड़ से
रोज़ ताकती है मुझे……….

Resham dori

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kyu baandh diya ye mera man
chahat ki resham dori mei…….

nazuk pankhuriyon wala man
samvedan shar se bindha hua
apni hi karuna mei dooba
apne taano mei khicha hua

tumne un taano ko khola
kuch aur naye taage jode
kuch aur naye bandhan rach ke
seema rekha ke mukh mode

mai bina jor khich jaati hun
rishton ki jorajori mei
kyo bandh diya ye mera man 
chahat ki resham dori mei