Monthly Archives: February 2016

मतलब

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कुछ बातों के मतलब है
कुछ बेमतलब की बातें हैं
मतलब से चोट लगे मन पे
बेमतलब से मुस्काते हैं

बस वक़्त की हेराफेरी है
और समझ समझ का जादू है
मतलब से रिश्ते टूट रहे
बेमतलब दिल मिल जाते हैं

बातों के मतलब की फितरत
मतलब की बातों से नफरत
बेमतलब बातों से उल्फत
मतलब मौसम से आते हैं

मतलब मतलब की बातों के
मतलब का जोड़ घटा करते
जीवन का मतलब भूल के हम 
मतलब का भार उठाते हैं

बज़िद

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ये माना हम जो कभी रूठे, मनाओगे ना तुम
फिर भी बाज़िद है ये दिल आज रूठ जाने को

कहते रहते है बहुत कुछ तेरे इसरार पे हम
ना कहने का भी कभी लुत्फ़ तो उठाने दो

आज कुछ देर से निकला था मगर चाँद ही था
इस हसीं रात को तन्हा ना गुज़र जाने दो

कभी बैठेंगे सभी शिकवे शिकायत लेके
इस उमर को तो मोहब्बत में संवर जाने दो

एक ज़रा बात पे ख़फ़ा हो, बुरा मान गए
क्या कहें तुमसे मगर, खैर, चलो जाने दो !

संभालने हैं बड़े दर्द अभी राहों में
चंद खुशियों के भी चिराग तो जलाने दो

साथ चलते तेरी खामोशियों के अफ़साने
लम्हा दो लम्हा कदम हमको भी मिलाने दो

तेरे दर पर सुकूं दुनिया जहां का मिलता है
दो घडी आसरे में हमको भी बिताने दो

जहाँ थक जायेंगे, रुक जायेंगे, सो जायेंगे
आँख जब तक ना लगे साथ तो निभाने दो

मोल-भाव

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एक दीवान के पन्ने भरते
सोचा थोड़ी देर ठहर के
कैसे मोल पे कलम चढ़ा दूँ?
किस किस भाव के भाव लगा दूँ?

लोग वक़्त का मोल लगाते
बिना मोल इन्सां बिक जाते
कितना नीचे भाव गिरा दूँ?
कैसे मोल पे कलम चढ़ा दूँ?

कौन पारखी ले पायेगा
कौन समझ इसे पायेगा
खोल जगत को जो दिखला दूँ-
किस किस भाव के भाव लगा दूँ?

अपने मय से लड़ते भिड़ते
मन को छलते, कभी उभरते
किस किस सपने को झुठला दूँ?
किस सपने को पँख लगा दूँ?

किसी आज ने मन बहलाया
बीते किसी कल ने था हँसाया
एक आस में उगने को कल
वक़्त पे कहाँ लगाम लगा दूँ ?

किस किस सपने को झुठला दूँ
किस सपने को पंख लगा दूँ
कैसे मोल पे कलम चढ़ा दूँ
किस किस भाव के भाव लगा दूँ !!!!

अनंत

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संभव और असंभव के
दो दूर छोर के मध्य कहीं
कुछ आस , नयन के सपने कुछ,
धड़कन अल्हड़ रहने को गयीं

ना बस पायीं, ना छोड़ी गली
ना बोल सकीं , ना चुप ही रहीं
एक पुरवईया का थाम छोर
संग सूर्य उदित हो और ढलीं ….

कोपल पे ओस शीत में बन
ऊष्मा में शीतल छाओं बनीं
बादल में गयीं तो रिमझिम सी
लहराती धरा से पुनः मिलीं

घर बार, नहीं संसार कोई,
जननी जो ह्रदय, उसकी भी नहीं
ना तात शीश जो हाथ धरे
जीवन संध्या तर्पण ना कोई

किन्तु खिलखिल किलकारी ही
जिस ओर चलीं, बिखराती गयीं
हर रात सावित्री सम यम को
ठुकरा, दुत्कार, पछाड़ चलीं