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अहम् ब्रह्मास्मि

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पत्थर को नतमस्तक होकर
मैंने ही देवत्व दिया है
मेरे ही “कर सेवा” श्रम से
होनी ने नव रूप लिया है

करुणा भाव में सराबोर हो
मैंने मानवता को रचा है
अहम् मद में डूब कुटिल मन
दैत्य रूप साकार किया है

मेरी आशाओं से जन्मे
नित्य नव पंख लें स्वपने
मेरी हताशाओं ने
हर टूटे मन का भार जिया है

वेद मैं ही, गीता भी मैं हूँ
मुझ में जग का सार बसा है
जननी भी, विध्वंस भी मैं ही
जो मैं ना हूँ, ये जग क्या है

मेरे स्पंदन से यह सृष्टि
दृष्टि में संसार बसा है
मुझ से जग, जग से ना मैं हूँ
ब्रह्म, महेष मुझी से रचा है