Category Archives: nature

The wait

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One day indeed
The clouds will pour
The rainbows will be real
The mangoes won’t be sour
The dawn won’t steal
The sweet little dreams

Untill then with hope
The little eyes shine
Each day look up
Couting tiny delights
More than a hundred
On each tree grew
The fruity green dew
The sunny days spent
Under the cool shade
Showing away the birds
Counting, the endless game!

One morning indeed
The colour would grow sunny
As yellow as the sun
As sweet as the dreams
And then no one can stop
The climb to the top
Savoring the “MALDA” feast
He slipped into sleep!

ख्वाब पागल ये

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सुबह अंगड़ाई सा उगता
बिखेरे बाँह किरणों की
नज़र पड़ते ही मुझपे
दौड़ के भर लेता बाहों में
और तब तक गुद्गुगाता
ना खोलूँ आँख मैं जबतक
ये सूरज रोज़ ही आके चुराता
मुझको ख़्वाबों से ..

बड़ा ज़िद्दी है पागल मन
हाथ थामे रहे दिनभर
चढ़ाता सर पे दोपहर
शाम बाहें कमर डाले
और हौले सुला देता
रात ओढ़ा के फिर चादर
आँख फिर से चमक उठती
जो चलती मिलने ख़्वाबों से।

ख्वाब भी कितने शर्मीले
नज़र दिन से चुराते हैं
रात चँदा के आँचल में
बंधे मन को लुभाते हैं
कभी बादल में उड़ते तो
कभी तारों में बस जाते-
तेरे नयनों के कुछ सपने
मिले कल मेरे ख़्वाबों से ।

तभी से ख्वाब जो थे
कल तलक पूरे ही मेरे से
आज आधे है तेरे
और हैं मेरे अधूरे से
कभी आँखों में मेरी झांकते
नींदें उड़ा देते
कभी पलकों में तेरी जा रुकें
तुझको भी तंग करते
रोज़ इनको भगाती हूँ
रोज़ मुझको सताते हैं
खता तुमसे करें तो माफ़ करना
ख्वाब पागल ये !!

Quote

“तुम चुप क्यों हो?”
चाँद ने अम्बर से पूछा।
“कल अमावस्या है,
तुम नहीँ मिलोगे।”
मासूमियत से अम्बर बोला।
खेल ही खेल में
धरती ने घूमना रोक दिया;
और एक रात की अमावस
एक उम्र सी लंबी हो गयी-
कभी सोचा ना था
लुका छिपी ये रूप दिखाएगी।
आज चाँद चुप है…… !

अमावस

फ़िदा

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साहिल से समुन्दर पूछ रहा-
वो कौन सी खूबी है तुझमे?
जिस शख़्स का हाल कभी पुछा;
तुझपे ही फ़िदा वो रहता है!

दूर-औ-दराज़ से आतीं सब
नदियां मेरे आगोश में हैं;
फिर भी तेरा ही नाम लिए
उम्मीद का दरिया बहता है ।

साहिल ने कहा मुस्का के ज़रा,
“चख लेना अपना स्वाद कभी।
तुम बाँध रखो आगोश में जग;
पंछी उड़ने को कहता है।”

नज़राने हीरे मोती के
कब काम किसी के आते हैं?
बस चंद साँस आज़ादी की
पाये वो दीवाना रहता है !

Quote

I am the river
Boundless and free
No fear to jump from mountain peaks
And splash into the valleys deep
No stones can hold me to a path
Neither can plains contain my vast

I jump and shriek
The songs of praise
The hills that springs
The freshest me
I glide and murmur soflty
The spurs to keep me flowing free

I am the river,
I am the tree
Sprouting from a seed tiny
Spreading my arms everywhere
Embracing birds that soon may flee

This being is my identity
This doing is my destiny
The more I fight
The more I give
I breathe all smiles
The more I live !

Live

सूरज चाचा

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बहुत सवेरे उठ जाते हो
रात भी जल्दी सोते होंगे
सूरज चाचा कभी कभी तो
तुम सोने को रोते होंगे
कौन तुम्हारी मम्मी है जो
इतना जल्दी तुम्हे उठाये
कभी नही सुनती जो तुम्हारी
रोज़ शाम वो तुम्हे सुलाये
कभी तो मन ये करता होगा
जागो रात तक चाँद देखने
तारों के नीचे लेटो और
आसमान पे चित्र बनाओ
और गर्मी की दोपहरी में
नींद भरी अँखियाँ झपकाओ
नीम तले दो पल बैठो और
एक चुटकी निंदिया ले पाओ
कितना रूखा जीते जो तुम
रोज़ एक ही रूप दिखाओ
वो ही पूरब से उदित हो
वो ही पश्चिम में ढल जाओ
चलो दोस्त मेरे बन जाओ
मैं तुमको जीना सिखला दूँ
जब मन चाहे हँसते रहना
जब मन हो रोना बतला दूँ
परी कहानी के तुम राजा
मैं राजा की गोद में खेलूं
तुमसे जग की डोर चले है
मैं जीवन की झप्पी ले लूँ ।

नज़ारों से गुफ्तगू

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कभी कभी जिंदगी से नज़रें चुरा
तेरी पनाह में रुक जाना
नदियों की कलकल,
चिड़ियों का चहचहाना,
बादलों का आना जाना,
सूरज का उठना, गिरना..
चाँद का नखरे दिखाना
ये नज़ारों से गुफ़्तुगू …..
बड़ा सुकून देता है ।

छानते रहना
बीते लम्हों से
मुस्कुराहटें जो आज भी
दिन को महका जाए खुशबुओं की तरह;
हौले से दुनिया से छिप
आगोश में भर लेना उन्हें-
रोज़मर्रा की भागदौड़ में भूले हुए
मन के सोये बच्चे को
फिर जगा देता है।

चाँद –
जब रात की पेशानी पे बिंदिया बन के
आसमां के सितारों से सजे
आँचल के बीच झिलमिलाता है
दूधिया रोशिनी में नहलाता
वो चाँद परियों की कहानियों सा
हसीं लगता है ।

दिन कभी उगता है
चोरी छिपे मुह अँधेरे
और देखे सभी उसके पहले
सिन्दूरी लालिमा में लजा
रात को प्यार भरी रोज़
विदा देता है ।

तुम कभी साथ जागो

रात को देखो बादलों का
रूठना मनाना चाँद को…..
और सुबह हौले से सुला देना-
उस खुमारी में देखना
वो तेरा साथ होना
इन लम्हों की खूबसूरती को
कितना बढ़ा देता है !

किरकिरी

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कल तेज बड़ी आंधी आई
उड़ गए थे उसमें ख्वाब कई
जो सालों साल सजाया था
धूमिल वो घरोंदा आज मेरा
देर तक रहा हवाओं का जूनून
और मैं बस कर रही इंतज़ार
उसके थामने का, गुजरने का
फिर दिल थामे हूँ देख रही
कोई ऐसा कोना जहां
ना धुल ने छोड़ा अपना निशां

फिर समय लगेगा सजाने में
अपना आशियां चमकाने में
झाड़ते पोछते एक एक कोना
धुंधलाई नज़र से देख रही
मैं वक्त के ज़ालिम खेल कई

और रह रह के फिर से उड़े
धूल सफाई करने में
आँख में घुस के चुभ रही
अंधड़ से जन्मी किरकिरी ।

अकेला

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राह खूबसूरत सी थी ।
एक लंबी सड़क को घेर सजे
पहाड़ी के हसीं मंज़र-
जो दोनों ओर से
जैसे लिए हों बाहों में;
सहलाते, संवारते उसको ।
ओट में अपनी रखें;
जहां की नज़रों से छिपा,
निहारते उसको।

ये जो पत्थर की टूटी फूटी सी
थी बाड़ बनी;
अपनी बंजर जमीं में भी,
हसीं लगती थी।
नाज़ में उसके लहरा रही राह
जैसे पर्दानशीं हँसती थी।

बहुत कम थी रहगुज़र
मगर जो भी गुज़रा
न बच सका पत्थरों की मोहब्बत से कभी
हरी भरी वादियों तक जाता वो रस्ता
दरक्खतों के बिना
कशिश अज़ीम रखता था।

ना जाने किस मगरूर शायर ने
फेके कुछ बीज
मोहब्बत के उसके बंज़र में
बीज तो होंगे बहुत से लेकिन
कौन पनपेगा उसके बीहड़ में
बिना पानी बिना खाद
बिना प्यार की छाया पाये?

एक मदमस्त ही रहा होगा
तोड़ के रस्मों के बंधन सारे
एक पत्थर के सीने पे लहराता है
वो अकेला है मगर फूल
उस वीराने को महकाता है !