Monthly Archives: October 2016

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ओंठ पे थी तैरती उथली एक हँसी 

चेहरे ने थी ओढ़ रखी जैसे सादगी

तोड़ के वो आवरण दुनिया के सभी

नयन गाँव झाँक एक बानवरा हँसा

ताक पे चढ़ा दीं सब शिकायतें

पल में ही भुला दीं सारी उलझनें

फिर से क़सम खा रहा मन ये सरफिरा

थाम के वो हाथ एक बचपना चला

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तुम मेरे मन की कस्तूरी?
तुम मेरे मन का ख़रबूज़ा!!!

भूख लगे तो आओ याद

रात चढ़े तो जाओ जाग

विरला तुमसा कोई ना दूजा

तुम मेरे मन का ख़रबूज़ा

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From archives 

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लक्षण रेखाएँ
स्नेह की

शरण की

ममता की

प्रणय की

त्याग की

उत्तरदायित्व की

अधिकार की 
अनेकानेक बन्धनों में बाँध हमें
उन्मुक्त रखती हैं जीवन सोपान को !!!!!

क़ैद या महसूस : एक नज़रिया