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मौसम से बेखबर

लहरों पर ठहर ठहर

चलता है शाम-औ-सहर

कश्ती का खामोश सफ़र

ʼ

उसपर मल्लाह करे

नहीं कभी अगर मगर

चाल चले ढीली ज्यूँ

ऊंघती सी दोपहर

.

उड़ा खिल्ली दौड़ चलीं

मछलियाँ चंचल औ चपल

किरण किरण सतह हँसे

सुबह शाम मचल मचल

.

झाँक गहरायी रही

कश्ती बौरायी नहीं

थाह लेती सिहर सिहर

साँस साँस सिमर सिमर

.

कौन चढ़े, उतर चले

कौन रुके, कहाँ फ़िकर

एक साँस नपें सभी

बरस गए बिसर बिसर

.

वहीं थमा लम्हा कोई

ना पाया गुज़र मगर

बढ़ पाए नहीं क़दम

उसी एक सूनी डगर

कश्ती का खामोश सफ़र

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मै छाँव बिछाये बैठी हूँ

तुम आओ कुछ पल बैठो तो

जब तक तपती धरती पर हो

कुछ बातें लू सी लगती हैं

और शब्द शब्द झुलसाती हैं

पर छाँव तले वो ही बयार

पत्तों से छनकर तपस त्याग

कितनी ठंडक पहुँचाती है

मै छाँव बिछाये बैठी हूँ

तुम आओ कुछ पल बैठो तो

तुम आओ तो

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I stayed in trance

With superfluous words

Unveiling

The helplessness

And restlessness

And each word

Adding new dimensions

To what was never meant

In that precious possession

Turning it

Sometimes to addiction

Or an obsession

Or Maddness

Or poison

Turning to everything

Unwanted

In what still stands

By me

In each moment said unsaid

And

Peeping through the shadows

Of the past

Is an unparallel warmth

Maintaining fractional sanity

Waking me time and again

Whether or not I Accept

The saviour “l”

That’s loved by many

Steps out

Takes charge

When about to give up

The ones who look up to me for strength

Hold me

And

I live!

I “live”

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एक दिन लौटी

तो एक साया साथ ही आया

दिन ढल चला था

रात गहराई हुई थी

रात की सियाह में

अक्स भी मिट चला था मेरा

जो साथ आया वो यकीनन मेरा तो

था ही नहीं

साथ ही रहने लगा वो

मेरा सा होके मगर

और एक अक्स सा रिश्ता

बना लिया मुझसे!

दिन गुज़रते गए

साल ढलते गए

अब मेरे साथ-साथ

साये दो-दो रहते हैं

तर्क करते हैं कभी

साथ हँसते हैं कभी

और अक्सर ही

गुफ्तगू मुझसे कहते हैं

बड़ी हलचल सी मचा रखते हैं

सूने मन में

यार पक्के वो मेरे बनके

मुझको सहते हैं

इतनी आदत सी हो चली है

अब तो उनकी मुझे

सारी दुनिया को रखके दूर

उनका हाथ पकड़

ना जाने घूमता है मन

बावरा किधर किधर,

बिगड़ गया है

एक पल नहीं रहता है ठहर

भीड़ दुनिया की सताने लगी है

अब मुझको

दोस्ती ख़ुद की ही भाने लगी है

अब मुझको

लोग कहते हैं

बेचारी बड़ी तन्हा सी है

हंसी उस समझ पे आने लगी है

अब मुझको

कब भला दुनिया मुझे ठीक

समझ पायी है?

किसने मुझसे रस्में रिश्तों की

निभायी हैं?

वो जिसने मुझमें झाँक कर

मुझे पहचान लिया

उस एक शख्स पे तलवारें

क्यू उठायी हैं?

कौन इन खामखा बातों पे

वक़्त ज़ाया करे

एक मेरा एक तेरा

जो साथ साया चले

उनकी आगोश में जन्नत सी

सिमट आई है

अब तो दुनिया से लाख अच्छी

ये तन्हाई है!

तन्हाई

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उम्र खाली एक नज़रिया!

जोश जब नादानियो का

बचपना तब दिल पे छाये

खून् रगों में खौल उठे

तब जवानी खलबलाए

चल रहा बेहद सम्भल कर

उम्र जब ढलने पे आए

याद में बीते दिनों के

खासता बुढापा जाए

लम्हा- लम्हा है बदलता

जोश भरता, या सिसकता

भुल सब, नादानी करता,

और कभी सम्भल के चलता;

औ’ बदलती उम्र संग में

पल में बूढी, पल में बच्चा

वक्त के हाथों मे खेले;

उम्र का चेहरा ना पक्का ।

नज़रिया

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तुमने खोया तुम्हारा तुम होना !

चाय से जो चली दास्ताने

होठ पे जो रुकी थी मुस्काने

नेह के कोर-कोर झुठला के

तुमने खोया हरिशचंद्र होना

तुमने खोया तुम्हारा तुम होना!

सुख दुख जो मिल बंट जाते थे

आतुर अंतर मदमाते थे

इच्छाओं के क्षणिक मोह मे

स्वप्न नगर का जीवन जीना;

तुमने खोया तुम्हारा तुम होना!

एक मन बांवरा तुम संग जीता

शब्दो से तेरे क्या ना सीखता

आशाओ की अपूर्व गागर का

उथला रीता पोखर होना

तुमने खोया मेरा निश्छल होना!

और बहुत कुछ जो है खोया

कौन ये गिनती कर पायेगा

उन भावों का, बीते कल का

मोल कोई क्या कर पायेगा

तुमने खोया एक जीवन सलोना!

निस्वार्थी वो रिश्ता था एक

ना छल कोई, ना दीवारें

मनमोहन के अतुल्य पदम से

दो नयना तुमको ही निहारें

वो अनमोल धरोहर खोना

दो बैना जो पूछ तुम्ही से

खोला करें अपनी पतवारे

कुछ बातों से संबल पाना

कुछ से कहीं एक ध्येय बनाना;

एक जीवन का कहानी होना!

और गिना कैसे मै पाऊं :

हम-तुम से हम और तुम होना

सिर्फ तुम्हारा मेरा जो मय था

उस मुझ मे से मेरा भी खोना

तुमने खोया तुम्हारा तुम होना !

मैंने वो खोया जो मेरा कभी था ही नहीं ; लेकिन तुमने वो खोया जो सिर्फ तुम्हारा था …..

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Tum tez chal rahe ho kitna
Aur dur ho gaye ho itna
Tham jaao, thoda saans to lo
Do chaar kadam peeche le lo
Thoda thoda pehle jaise
Kuch aahista si chaal chalo
Is bhaag si rahi duniya mei
Thehre se kuch lamhe jee lo

Ye Jo kho gayi si baatein hain
Aur nayan na jo muskaate hain
Ek nazar inaayat unpe do
Ek abhay daan phir
hamko do

Uffff suno kabhi to thoda sa
Ufff bas bhi karo ab chup todo
Itna bhi nahi tum khafaa raho
Itna bhi nahi tum door raho

Dil chup se ghabraa jaata hai
Aur roz haarta hai dar se
Tum kho jaaoge rasmo mei
Rozmarra ki kasmo mei
Kuch bhi to ab na maang rahi
Bas thoda sa hi saath raho

Bas thoda sa saath