Category Archives: hope

देखो पंख लगे हैं गाने

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दूर गगन में फैलाये पर
चाँद को छू लेने को तत्पर
नन्ही चिड़िया छोड़ घरोंदा
आज भरे ऊँची उड़ाने
देखो पंख लगे हैं गाने ।

चीलों का डर नहीं सताता
ना थकान से मन घबराता
मिटा असंभव का अस्तित्व
उड़े आस के छेड़ तराने
देखो पंख लगे हैं गाने ।

खेल सभी बचपन के छूटे
लहु यौवन का बाहें खींचे
तान उमंगों की कमान
जग को अपनी हस्ती दिखलाने
देखो पंख लगे हैं गाने ।

The wait

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One day indeed
The clouds will pour
The rainbows will be real
The mangoes won’t be sour
The dawn won’t steal
The sweet little dreams

Untill then with hope
The little eyes shine
Each day look up
Couting tiny delights
More than a hundred
On each tree grew
The fruity green dew
The sunny days spent
Under the cool shade
Showing away the birds
Counting, the endless game!

One morning indeed
The colour would grow sunny
As yellow as the sun
As sweet as the dreams
And then no one can stop
The climb to the top
Savoring the “MALDA” feast
He slipped into sleep!

ताज मेरा तेरा सा…..

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इस किनारे मैं खड़ी;
और तुम रुके थे उस किनारे-
रात आधी, चाँद आधा,
और यमुना की लहर पे
ताज की परछाई छनती;
कह रहीं,
ये ताज मेरा-तेरा सा।
एक कंकड़ ने उछल कर सब मिटाई-
बात भी सब,
और सारी परछाई।
कुछ भी मेरा तेरा क्या?
पर ना जाने क्यों ना माने,
आज भी मन भाग जाता;
चांदनी में भीगते से
ताज को फिर से मनाने,
रूठे लम्हों को बुलाने,
और तुमको भी है पाता:
उस किनारे खोये से कुछ,
ढूंढते कुछ,
कहते कहते;चुप से कुछ कुछ।
बात आधी ही उठी थी,
आँख आधी ही खुली थी,
देखने को था बचा
और कहने को था कितना सब कुछ;
वो अधूरी बातें ही तो खींचतीं हैं,
बाँध के रेशम की डोरी में हमे फिर
और फिर मैं चाँद से ही पूछती हूँ-
कब मिलेगा?
पल वो पूरा-ना रुकेंगे शब्द जब फिर,
चाँदनी में जब दिखेंगीं तेरी नज़रें,
और ना रह जायेगा कुछ अनकहा;
कुछ भी अधूरा…..
आएगा कब पल वो पूरा???

वो लम्हा…

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दिन उग जाता मगर चढ़ता नहीं है
बस उसी एक लम्हे में रुका सा
मैंने जब खोल के पलकें तुम्हे देखा किया
और हौले से हाथ फेर सर पे,
‘उठो’ कहा
वो ही लम्हा ठहर सा जाता है;
रोज़ ही-
सुबह से जाने कब तब…..
यूँ ही बालों में तेरे फेरते उँगलियों को,
तेरी एक आवाज़ के टुकड़े को देखा करूँ,
कब मुझसे मिलेगा –
और वो भी मुस्का के कहे,’सोना’!

दिन उग जाता है और फिर अकस्मात् ही
चढ़ जाता है सीधा दोपहर में
रोज़ अलसायी सुबह जागती है
तेरे दो पल के पीछे भागती है
और अक्सर ही वो पल दूर जा रुकते हैं
क्षितिज के सहराओं पे कहीं
दिन तो उग जाता है हर रोज़ ही
दिन मगर सदियों से उग कर रुका है ।

सूरज चाचा

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बहुत सवेरे उठ जाते हो
रात भी जल्दी सोते होंगे
सूरज चाचा कभी कभी तो
तुम सोने को रोते होंगे
कौन तुम्हारी मम्मी है जो
इतना जल्दी तुम्हे उठाये
कभी नही सुनती जो तुम्हारी
रोज़ शाम वो तुम्हे सुलाये
कभी तो मन ये करता होगा
जागो रात तक चाँद देखने
तारों के नीचे लेटो और
आसमान पे चित्र बनाओ
और गर्मी की दोपहरी में
नींद भरी अँखियाँ झपकाओ
नीम तले दो पल बैठो और
एक चुटकी निंदिया ले पाओ
कितना रूखा जीते जो तुम
रोज़ एक ही रूप दिखाओ
वो ही पूरब से उदित हो
वो ही पश्चिम में ढल जाओ
चलो दोस्त मेरे बन जाओ
मैं तुमको जीना सिखला दूँ
जब मन चाहे हँसते रहना
जब मन हो रोना बतला दूँ
परी कहानी के तुम राजा
मैं राजा की गोद में खेलूं
तुमसे जग की डोर चले है
मैं जीवन की झप्पी ले लूँ ।

ख़फ़ा

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ये जो सुन लेते हो तुम हर लम्हा
बिन कहे धड़कनें सभी मेरी
और धीमे से फुसफुसाते हो-
ना जाने कितनी अनकही वो तेरी
अब जो मुझसे करें है बात कभी
मैं झिड़क के उन्हें चल देती हूँ ।

जो मिल जाए कहीं नज़र मेरी
तुम्हे बता देंगी-
आज कितने ख़फ़ा हैं तुमसे हम !

अकेला

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राह खूबसूरत सी थी ।
एक लंबी सड़क को घेर सजे
पहाड़ी के हसीं मंज़र-
जो दोनों ओर से
जैसे लिए हों बाहों में;
सहलाते, संवारते उसको ।
ओट में अपनी रखें;
जहां की नज़रों से छिपा,
निहारते उसको।

ये जो पत्थर की टूटी फूटी सी
थी बाड़ बनी;
अपनी बंजर जमीं में भी,
हसीं लगती थी।
नाज़ में उसके लहरा रही राह
जैसे पर्दानशीं हँसती थी।

बहुत कम थी रहगुज़र
मगर जो भी गुज़रा
न बच सका पत्थरों की मोहब्बत से कभी
हरी भरी वादियों तक जाता वो रस्ता
दरक्खतों के बिना
कशिश अज़ीम रखता था।

ना जाने किस मगरूर शायर ने
फेके कुछ बीज
मोहब्बत के उसके बंज़र में
बीज तो होंगे बहुत से लेकिन
कौन पनपेगा उसके बीहड़ में
बिना पानी बिना खाद
बिना प्यार की छाया पाये?

एक मदमस्त ही रहा होगा
तोड़ के रस्मों के बंधन सारे
एक पत्थर के सीने पे लहराता है
वो अकेला है मगर फूल
उस वीराने को महकाता है !