Monthly Archives: August 2018


*प्रश्नपत्र है जिंदगी,*

*जस का तस स्वीकार्य….*

*कुछ भी वैकल्पिक नहीं,*

*सबका सब अनिवार्य…*



प्रश्न पत्र के हल हेतु

करे जतन भरमार

वैकल्पिक ही ज़िंदगी

तभी करम से प्यार

भाग्य की चादर ओढ़ें वो

माने जो अनिवार्य

कर अरचन अनिवार्य का

पा लें अंक हज़ार।

कितने पे उत्तीर्ण है

माप बताओ यार

अनुत्तीर्ण किन अंक पे

हल हो उस अनुसार

अनिवार्य पे शत प्रतिशत

होगा क्या अनिवार्य ?

वैकल्पिक पे काटे अंक

बोले पालनहार?

जीवन दौड़ बोलो क्या

मापदण्ड अनुसार ?

अव्वल , प्रथम दर्जे से

भला हो किस प्रकार?

नाम बताओ किस मानस ने

अनिवार्य को माना

पूरा प्रश्न पत्र हल कर

किसने अमरत्व को जाना?

वैकल्पिक का अनुसरण कर

किसने जीवन हारा ?

तो फिर बोलो इस भेद का

क्या है कोई आधार?

सुन री सखी, विवेचन छोड़

जीवन को संभार

जिस दिशा की चले पवन

वैसी खोल पतवार

कही-प्रतिकही -II


As I sit today

In my cozy lab

Structured to my taste

over the years;

Marked by memories

Sweet and sour!

Suddenly today-

It has one face all over……

And so does my soul

As if time decides to pause

Around me for today

And I look back

Down the hill

From where I stand

The friends i lost

The age i gained

The faces that smile

Today,to my fame….

All worthless it seems

All hollow and futile

For not one gives me pleasure

Not one spurs a smile

Saddened, still I laugh

On the silly beats inside

Which thinks and yet thinks not

Which lives and yet lives not

And a day or two when gone

This very reluctant today

Will be bright tomorrow again

The faces of adorable kids

Will be all that I retain

From these walls and this room

From this place…..from this school

And no traces of foes

Or friends shall stay in the ride

As I cross boundaries

And take newer flights..

So I say

Cheer up o heart

So I say

Feel not apart

Miss not thou

When gone




क्रोध मनुज पर आता है

बता रहे मुनिवर सारे

होए मनुज कमज़ोर कभी

और यदि वो कभी हारे !


हार हुई तो बस मेरी

लाख किए झगड़े सारे

स्वयं से भी और तुम से भी

युद्ध सभी प्रतिदिन हारे,


प्रबल समझ के जन जन ने

क्या ना करण मुझ पर डारे

अंतर्मन से निर्बल हो

अस्त्र तज दिए अब सारे


क्योकर तुम अंगार बने ?

प्रबल अस्त्र हैं तुम्हारे ।

और क्योकर ख़ूँख़ार हुए-

कौन युद्ध जो तुम हारे ?


देखो शीश नवाते हैं

जो ठहरे तुम्हरे द्वारे

हम ही नहीं सब बंधुवर

आज भी समक्ष तुम्हारे


सुफल, सफल, सम्पन्न, सुखी

मनके तुमपे हैं न्यारे

तुम पर वारी जगत रीत ने

आशीष की बौछारें


मुनिवाणी को झुठलाते

रूद्र रूप क्यूँ हो धारे ?

क्रुद्ध हृदय को करो करूण

प्रबल रहो तुम, हम हारे !



She walked in to me

With the warmest smile

And a token wrapped

To mark a mile


Catching me unaware

Nudging a smile

To the moist eyes

And a heart that almost died


And i forced to respond

To the bond so strong

With a hug tighter

And much much long


What mattered wasn’t words

But the very being

What was missed was again

“The very being”


The tone of the day

Was yet so fresh

The emotions thereafter

Could never come to rest


And she held out to me

From the beautifully wrapped

I just lost all words

As a “scarf” kinda “slapped”


The jacquared gleaming one

In hues of green and blue

Was I actually getting one ?

But it wasn’t from “you” !


Yes it slapped me so hard

And I knew no other words

“Dunno how to use ”

Was all I could have said


What would have been your said

Came reflecting just the same

“I will teach, don’t worry”

An innocent reply came !


The moments grew more moist

And poisoned responses …

To all that happened thereafter

Oblivious were my senses


The more silence when practised,

The more grows the pain

The destiny as if playing

The game of “loss and gain”


Closer thou shall stay

The calling comes from nowhere

Farther you go away

Your moments somehow reappear



Friendship Day & Scarf


किसी ( आशीष प्रियदर्शी) ने ख़ूब है कहा

कब कौन रूठ जाएकिसको पता

मना लो ; इतना वक़्त कहाँ


मन विद्रोही मेरा ना करे ये स्वीकार

प्रश्न फिर भी उठे ये ही बार बार

मानना आए नहीं

तो सीखें किससे कला?

और जो ना माने कोई,

उसपे क्या ज़ोर चला ?

रूठ के कौन है बैठा

ढूँढ लेंगे हम मगर ;

वक़्त ही रूठे अगर,

तो जाएँ कहाँ भला?

बुआ(सरोज श्रीवास्तव) ने सुझाया :-

रहिमन चुप हो बैठिये देख दिनन के फेर

मन फिर बग़ावत पर आया :-

कान्हा संग मन जोड़ के कर्म से लागे नैन

कौन जतन अब बैठिये रोक हाथ और बैन