Category Archives: pain

ख़राश

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कुछ आवाज़ में आज फिर ख़राश थी ;
किसी आरज़ू में दबी सी वो रात थी !

तुम ठहर गए कहीं देखते हमें-
आँख मूंदे बेखबर चलते हम रहे।
उस बेखबरी में भी क्या खिलाफात थी?
तेरी ही पनाह ने ये नेयमात दी!

और खुद ही तुम खफा बख्श कर हमें!
हम समझ सके ना कुछ, सिसकते रहे।
अपनी ही नासमझी ने कब मियाद दी?
बार बार ठोकरें राह में लगीं !

खौफ ज़दा अब है दिल, ख्वाब से बचे।
और ख्वाब में ही मगर जागते हुए-
एक बार खुदही से फिर जंग ठान ली !
एक बार ढूँढने खुद को फिर चली !!

रात.

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रात सिसकी भी सो नहीं पायी

बरसा करते रहे बिना मौसम
जाने आये कहाँ से कल बादल
शोर बूंदों ने इस कदर ढाया
नींद डर से इधर नहीं आयी

क्यूँ

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क्यूँ…

कितनी बातें
कितनी यादें
कितनी गलतियाँ
पूछ पूछ थकें

हर नज़र
हर वक़्त
हर जुबां
एक ही प्रश्न

मीत ने उठाया
मन ने दोहराया
रिश्तों ने सुनाया
पलट पलट आया

ना कोई जवाब
ना कोई बचाव
गहने सा साजये
चेहरे से छुपाएं

और दिन भर के बाद
दुनिया से भाग
जो आइना देखूँ
तो सामने पाऊँ

वो ही एक सवाल
खुद से दोहराते
ना कोई जवाब
फिर भी रहे “क्यूँ” !

नींद

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जगे हैं देर तक बहुत
थोडा और सोने दो
करो बादल से कुछ सौदा
थोड़ा सूरज को ढक लो

आस से झिल्मिलातीं
भोर की किरणें मिटा देंगी
सभी कारण पड़े रहने के
उनको कैसे भी रोको

और कहना बादलों से
बरस जाएँ ना धोखे से
करें बूंदों की रिमझिम शोर
मुझको चुप में रहने दो

ना महके आज रजनीगंधा
भँवरें उनपे ना डोलें
ये मेरे मन को भाने वाले
सारे खेल बंद कर दो

तुम्हे जाना है तुम जाओ
जगत में विचर के आओ
पीड़ से टूटते हैं पैर
मुझको यहीं रहने दो

और ले जाओ अपने साथ
मेरी सोच के पहरे
सोना आज है गहरा
अकेला मुझ को रहने दो

Quote

वो राह तो चलते जाना है।

हम एक चले अनजान डगर
तुम एक मिले ना हमसफर
और एक जुड़े, और एक जुड़े
बस राह पे चलते जाना है।

चले इधर उधर हमडगर कभी
कभी प्रीत से बंधते रहे सभी
कभी तकरारें, कभी तलवारें
कैसे भी राह निभाना है।

पाना है क्या- कुछ भी तो नहीं
खोना है क्या-कुछ भी तो नहीं
“कुछ भी तो नहीं” के ऊपर पर
सब कुछ का दाँव लगाना है।

जब आँख खुले, नापे तौले;
जब बैन हिलें, तीखा बोलें
“तुम” को भांपते रहने में
बस ध्येय “स्वयं” को जिताना है।

और राह बढे, और समय चले
और राही पाये स्वप्न नए
और एक जुड़े, और एक जुड़े
उस राह का नहीं ठिकाना है।

बस साँस थकी, अब और नहीं
अब प्राण शेष थोड़े ही सही
ना चाह शेष, फिर भी है कमी
किस राह से मुक्ति पाना है?

ढूंढें हैं सभी के थके नयन
एक तृप्त हँसी, एक गहन शयन
फिर जोड़ रहे मुड़ प्रीत डोर
अब सही डगर को जाना है।

ना रुके कभी, ना झुके कभी
जो सीने चौड़े तने कभी
कुछ देर ठहर, थोडा झुककर
नतमस्तक हो पहचाना है

वो राह तो चलते जाना है ।
वो राह तो चलते जाना है ।

Dedicated to the Landmark forum.
With regards to Ramesh Sir!

राह

ताज मेरा तेरा सा…..

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इस किनारे मैं खड़ी;
और तुम रुके थे उस किनारे-
रात आधी, चाँद आधा,
और यमुना की लहर पे
ताज की परछाई छनती;
कह रहीं,
ये ताज मेरा-तेरा सा।
एक कंकड़ ने उछल कर सब मिटाई-
बात भी सब,
और सारी परछाई।
कुछ भी मेरा तेरा क्या?
पर ना जाने क्यों ना माने,
आज भी मन भाग जाता;
चांदनी में भीगते से
ताज को फिर से मनाने,
रूठे लम्हों को बुलाने,
और तुमको भी है पाता:
उस किनारे खोये से कुछ,
ढूंढते कुछ,
कहते कहते;चुप से कुछ कुछ।
बात आधी ही उठी थी,
आँख आधी ही खुली थी,
देखने को था बचा
और कहने को था कितना सब कुछ;
वो अधूरी बातें ही तो खींचतीं हैं,
बाँध के रेशम की डोरी में हमे फिर
और फिर मैं चाँद से ही पूछती हूँ-
कब मिलेगा?
पल वो पूरा-ना रुकेंगे शब्द जब फिर,
चाँदनी में जब दिखेंगीं तेरी नज़रें,
और ना रह जायेगा कुछ अनकहा;
कुछ भी अधूरा…..
आएगा कब पल वो पूरा???

परछाई

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बहुत सी बात कहनी है
बहुत सी बात सुननी है
वो एक अधूरी दास्तां
अपने दामन से चुननी है

कभी हम कह नही पाते
कभी तुम रोक लेते हो
कुछ तो खुद ही से हम हारे
और कुछ ऐंठ के मारे

अब तो डर सा सताता है
तार ये जो जुड़े दिल के
कहीं कल चरमरा जाएँ
ये भी जंग के मारे

ना कोई मोम ही पिघले
ना कोई तेल की परतें
रोज़ ही धुप में पकते
कभी बारिश इनपे बरसे

चाँद भी आये जब जब लेके
मलहम सर्द रातों का
तेज़ कर जाए चढ़ना
तार पे जंग यादों का

रोज़ देखे मुझे छुप छुप
और नज़रें चुराए भी
मन में ही रहती है हरदम
और मन से ही भागे भी

बहुत ज़िद्दी है तेरी याद
बिलकुल तेरे जैसी है
बस इसी बात से ये साथ
परछाई सी रहती है ।

वो लम्हा…

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दिन उग जाता मगर चढ़ता नहीं है
बस उसी एक लम्हे में रुका सा
मैंने जब खोल के पलकें तुम्हे देखा किया
और हौले से हाथ फेर सर पे,
‘उठो’ कहा
वो ही लम्हा ठहर सा जाता है;
रोज़ ही-
सुबह से जाने कब तब…..
यूँ ही बालों में तेरे फेरते उँगलियों को,
तेरी एक आवाज़ के टुकड़े को देखा करूँ,
कब मुझसे मिलेगा –
और वो भी मुस्का के कहे,’सोना’!

दिन उग जाता है और फिर अकस्मात् ही
चढ़ जाता है सीधा दोपहर में
रोज़ अलसायी सुबह जागती है
तेरे दो पल के पीछे भागती है
और अक्सर ही वो पल दूर जा रुकते हैं
क्षितिज के सहराओं पे कहीं
दिन तो उग जाता है हर रोज़ ही
दिन मगर सदियों से उग कर रुका है ।

Quote

Tonite
I want to get drunk
The intoxication
To last for life
The spirits
To float free
With endless smiles
The courage to speak
My soul out
The freedom to let go
The tears I hold
Yearning not
For the friends
Hinding no more
From the foes
Dancing again
The steps of gold……
Tonite
I yearn to live
Wear again the bliss
This strong Tonite…
I want my drink !

Free me