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एक खेल था खेला मिट्टी में

दो लोग बने उस मिट्टी से

मैं अपने जैसा एक पहले

अपने जैसे एक पहले तुम

कितने सुंदर दो मीत चले

बगिया बगिया महके महके

हँसते गाते , कभी लड़ते भी

छवि एक मेरी और दूज़ी तुम

झगड़ा जब जब जो बढ़ जाता

मिट्टी के तोड़ते हम और तुम

रूसा-रूसी के बाद मान

जुड़ बन जाते- एक मैं, एक तुम

इस तोड़ मिटाने बनाने में

मिलती जाती अनजाने में

तेरी मिट्टी कुछ कुछ मुझसे

मेरी मिट्टी में कुछ कुछ तुम

क्यू आज रूठना ऐसा हुआ

जाने कब से टूटे बैठें

अपनी अपनी मिट्टी लेके

हैं दूर बहुत ही हम और तुम

पर नहीं दोबारा बन पाते

तुम जाकर दूर भी दूर नहीं

और पास जो मेरे मिट्टी है

उसमें हो बहुत जियादा तुम

ना फेंक सकूँ, ना मिटा सकूँ,

ना कोने कहीं पे दबा सकूँ,

कि हर बारिश से महक उठे

सोन्धे सोन्धे थोड़े से तुम

ना सिमट सकी है समेटे भी

बिखरी पैरों के संग चल के

घर में, बाहर, और अन्तर में-

ढेले ढेले मिट्टी में तुम

जाने कैसे तो मिटा दिया

तुमने क्या मुझको भुला दिया?

मेरे हिस्से की मिट्टी से

कैसे तुम रच लेते बस तुम???

कल खेल खेल में हँसते थे

फूलों से भरे सब रस्ते थे

मिट्टी के मीत बनाते में

ख़ुद टूट गए – कुछ मैं, कुछ तुम!

हिस्सा मेरा वापस कर दो

पहले ही सा पूरा कर दो

और ले जाओ जो पास मेरे

आधा-पौना, अनजाना तुम;

फिर से बारिश है आने को

सोन्धा मिट्टी महकाने को

सीली सीली रह जाऊँगी

फिर से छाओगे ऐसे तुम!!

मिट्टी के खेल