Monthly Archives: April 2015

उम्र

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उसकी पेशानी पे अब
वक़्त की लकीरें नज़र आने लगीं;
उम्र दिखने लगी है
उस हसीं चेहरे पे-
नूर से जिसके कभी
सुबह-ओ-शाम होती थी!

माँ लोरी करुण सुनाती है

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था स्नेह लहू से सींचा उसे
युगों युग बगिया को रोपा
पल्लवित पुत्रों पे हो गर्वित
जग को जीवन रस से लीपा
माँ फूली नहीं समाती थी

मानव का था फिर रूप रचा
कृतियों में जो सर्वोत्तम था
कितनी आशाओं से उसको
दी जग की बागडोर थमा
माँ यौवन में मदमाती थी

पर हाय नहीं वो सकी मिटा
मनु की अंतहीन इच्छा
वो भूख मनुज के अन्तर की
हर दिन जन्मे नयी वासना
उपदेश दे माँ रह जाती थी

बस देखती रह गयी धरा
पल पल झरता फिर वस्त्र हरा
कितने यत्नों से बड़ा किया
पल में उसने जो दिया गिरा
हर दिन शव एक सुलाती है

क्षण क्षण बढ़ता जाये विषाद
माँ का कब तक हो मूक विलाप
अब और नही , गोदी में भर
माँ हिंडोले झुलाती है
माँ लोरी करुण सुनाती है

अपने पुत्रों के शव को भर
अंक में अपने, कोमल कर
फेर शीष, करती प्रयास
कुछ साँस शेष जो आतीं हो
माँ कातर स्वर में गाती है

ना खुलते अब वो मुंदे नयन
विच्छिप्त ह्रदय से आहें भर
क्रोधित, द्रवित,विचलित, वहशी
जननी की गोद थर्राती है
माँ चिर निद्रा सुलाती है

अब क्यों है घबराता मानव
चल देख विनाश का ये तांडव
रोके ना रुके ये अश्रु धार
जो चीर ह्रदय बह आती है
माँ लोरी करुण सुनाती है

पावों में सपने चुभते हैं

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इतना आसां भी नही बादलों पे चलना-
पाँवों में सपने चुभते हैं!
उड़ते जाऊं हवा के संग
खुली आँख मगर कैसे?
जो उड़ते संग धूल के कण,
आँखों से आसूं रिसते हैं।

Tremors

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There’s a stirr up
Deep in the core-
The earth’s womb  hurts
And bleeds;
As it shifts
To shake all roots
Of the greens endangered,
As also the foundations
Of our manifestaions.

Establishing in a jerk
Its motherly might.
Demanding its right
To be left undug,
Not messed and molested
No more patience
To be tested,
Ripped or raped!

For these bits of disaster
Are just too small
The endurance all along
Comes from the strength
That can dance to the tunes
Of “Shiva’s Taandav”
The other face of creator-
Is the very destroyer !