Monthly Archives: May 2015

ख्वाब के फलसफे

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रेल के डिब्बे की वो
अजब से सौंधेपन वाली महक
मछली बाजार सा शोर गुल
हर कोई हर एक को टटोलता
अपने अपने सामान के ध्यान में
दुसरे के ईमान को तौलता
फिर एक सीटी और एक झटके के साथ
धीरे धीरे खिसक चली ट्रेन..

बन्धु यात्री से समझौता करते
अपनी अपनी जगह बनाते
वो काले कोट में आते दिखे टीटी
अपनी जेबें से खोज टिकेट सामने रखी
और इत्मीनान से साँस लेने की सोची

चाय चाय की गुहार
बेचते पत्रिका, समाचार
एक के बाद एक आते गए
मेरी तन्द्रा भंग करने
चलते फिरते इश्तेहार
और जो वो थोडा रुकें
तो पडोसी कुछ पूछ लें

कहाँ से आ रहे हो?
कहाँ को है जाना?
जानते नहीं आपको,
फिर भी लगते कुछ पहचाना!
दादा नाना तक बात पहुचाई
तब भी पहचान ना निकल पाई

और थक हार कर फिर
थोड़ी सख्ती हमने दिखाई
बमुश्किल उनसे निज़ात पाई।
अपनी कलम निकाल
ज्यो सोच थोडा दौड़ाई
तो रेल के हिचकोलों ने
बचपन के झूले की याद दिलाई

कलम को उंगली में फॅसा
डायरी को सीने से लगा
कुछ पैर फैलाये, कुछ ख्वाब सजाये
पलकों की बात मान
दुनिया से हटा ध्यान
निंदिया गले लगाते हैं
पालने सा सुख उठाते
वो रेल की अनूठी
खुशबू में मदमाते
हम ख्वाब में ही ना जाने कितनी
कवितायेँ कहे जाते हैं

सुबह जो आँख खुलेगी
डायरी साफ़ मिलेगी
और शब्द सभी भुला
कुली को बुला
सामान उतारते
दिनचर्या में खो जायेंगे
ये ख्वाब के फलसफे
ख्वाब में ही रह जाएंगे
ये खव्वाब के फलसफे
ख्वाब में ही रह जायेंगे ।

May

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May

He may
He may not
I wondered
And i fought
My own mind-
The spolit lot!

Yes May it was
I dared to go
The house was warm
His face did glow

I trembled but
I fumbled yet
His calm sustained
What I long lost

The hands of clock
But never stopped
His eyes drugging
And I stayed back

A little longer
With him, yet loner
Stay more, insisted
The voice so soft

I would have gone
I wouldn’t have come
“What if..” that day
I miss the “last May” !

अहम् ब्रह्मास्मि

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पत्थर को नतमस्तक होकर
मैंने ही देवत्व दिया है
मेरे ही “कर सेवा” श्रम से
होनी ने नव रूप लिया है

करुणा भाव में सराबोर हो
मैंने मानवता को रचा है
अहम् मद में डूब कुटिल मन
दैत्य रूप साकार किया है

मेरी आशाओं से जन्मे
नित्य नव पंख लें स्वपने
मेरी हताशाओं ने
हर टूटे मन का भार जिया है

वेद मैं ही, गीता भी मैं हूँ
मुझ में जग का सार बसा है
जननी भी, विध्वंस भी मैं ही
जो मैं ना हूँ, ये जग क्या है

मेरे स्पंदन से यह सृष्टि
दृष्टि में संसार बसा है
मुझ से जग, जग से ना मैं हूँ
ब्रह्म, महेष मुझी से रचा है

बात

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बड़ा लम्बा सफ़र है
कुछ तो बात करो
समय को आज हरा दो
हमसफर तुम रहो
निगाहें दूर तक फेरीं
अजब से लोग दिखते हैं
निगाहें मूँद के मीता
करीब तुम रहो
काफिले कब रुकेंगे
पड़ाव बहुत हैं अभी
अलाव एक जला के
दो घड़ी को रुको
तुम्हारे फलसफे सुनके
होश में रह सकूँ
जिंदगी की कश्मकश से
मुझे सुकून दो

गोटी

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धूल, मिट्टी,धूप,बारिश
कुछ भी कभी रोक ना पायी
उसने जो आवाज़ लगाई
इसने हर जेहमत उठाई
माँ को मनाया, पैर दबाये
पिता जी की डाँट भी खाई
चोरी से सबकी नज़रें बचा के
अपनी तिज़ोरी की ताली उठाई
चिकने चिकने,गोरे गोरे
देख उन्हें नज़रें ललचाई
एक इशारा सीटी का पा
दिल की उमंगें लें अंगड़ाई
भर हथेली में, छिपा जेब में
चले खेलने गोटी भाई !

तुम

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तुम दूर मेरे या पास मेरे
मन में हर पल हो बसे रहे
जग से थक कर भी तुम्ही शरण
तुम से लड़ कर भी चाहूँ तुम

मधुरिम सबसे जो जगह लगी
वो अंक तुम्हारे समा मिली
तेरे नेह बसी एक मेरी छवि
और मेरे रोम रोम में तुम

नन्हे एक फूल के आने से
जीवन में स्वर गुंजन करते
सृजन के इस अक्षुण पल से
कुछ और बंध गए मैं और तुम

हर दुःख का तोड़ तुम्हारा स्पर्श
और सुख का चरमोत्कर्ष भी स्पर्श
माया की आपाधापी में
अलौकिकता का स्पर्श हो तुम ।

– 14/02/03
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