Category Archives: Relations

कह दो ना….

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रखो ना क़ैद में हर्फ़
रख ना पाओगे।
बोल लम्हों से जुड़े है
वहीँ खो जायेंगे
उम्र चढ़ती चलेगी
दौर गुज़रते रहेंगे
वही तुम होंगे ..वही हम
अलफ़ाज़ वही,
मायने बदल जायेंगे !

Desires

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The desires
Are like raindrops
Tiny
Yet numerous
Which pour
In volumes
Drenching thyself
Yet not quenching
The undieing thirst
…..
The driving force
To struggle
The yearing
To win
The hope
For warmth
The lust
For love
Embracing it all
They keep
Growing tall
Life’s fire
A worthy “Desire”!!!

इतनी सी बदमिज़ाज़ी

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प्याले में कहाँ आ सके
बोतल शराब की
आँखों में देखते रहे
और डालते गए!

अरसे के तलबगार हैं
ये प्यास बुझे ना
बारिश बड़ी नमकीन है
ज़ज़्बात भर गए!

हर्फों का खेल ही तो था
खामोशी ने खेला
नज़रों की खताओं से
सौ गुनाह कर गए!

ना नाम के थे मोहताज़
ना ही ताज के
कुछ कहते कहते रुक गए
हँस के गुज़र गए!

एक लम्हा था रुक कहीं
हाथ छुड़ा के
इतनी सी बदमिजाजी थी
अफ़साने बन गए!

अधूरी सारी बातें

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रात आधा चाँद मुझको ताकता है
और आधा जाम आँखों में घुला है

बोल आधे ही घुले से बात में हैं
नैन आधे ही खुले, कुछ ख्वाब में हैं

चल दिए कुछ दूर तक धीरे से बादल
और आधी दूर जाके क्यों रुके हैं

रात रानी की महक आधी उड़ी सी
और कुछ फूलों में बस के रह गयी सी

थाम के तुम चल रहे हो हाथ मेरा
सब अधूरा, पूरा बस एक साथ तेरा!

है बड़ी ही खूबसूरत सी, अधूरी सारी बातें
रह रहीं हैं संग हमारे, गुन गुन गुनगुनाते-

चाँद मेरी खिड़की में से झांकता सा
बादलों का जिसपे पर्दा सा गिरा है

रात रानी खुशबुएँ बिखेरती सी
गुलदान में खड़ी शरमा रही सी

रोज़ ही एक ख्वाब बनता है कहीं पे
हाथ तेरे ख्वाब मेरे पालते हैं

है बड़ी ही खूबसूरत सी, अधूरी सारी बातें
रह रहीं हैं संग हमारे, गुन गुन गुनगुनाते

थाम के तुम चल रहे हो हाथ मेरा
सब अधूरा, पूरा बस एक साथ तेरा!!!

कुछ कमी सी….

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शब्द आते है लौट जाते हैं
मिसरा अटका हुआ है जैसे कहीं
रात भी बीत चली है लेकिन
सुबह भी अब तलक हुई ही नहीं

इन पहाड़ों की हसीं वादियों में
कुछ कमी सी रह गयी है कहीं
सर्द झोकों की याद आती है
बूंदों में कल नमी भी थी ही नहीं

रोज़ होठों पे तैर जाती है
वो अधूरी सी कुछ लगे है हँसी
कुछ तेरी आँख में जो ठहरें हैं
सवाल वो मिटेंगे भी क्या कभी?

क्यूँ

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क्यूँ…

कितनी बातें
कितनी यादें
कितनी गलतियाँ
पूछ पूछ थकें

हर नज़र
हर वक़्त
हर जुबां
एक ही प्रश्न

मीत ने उठाया
मन ने दोहराया
रिश्तों ने सुनाया
पलट पलट आया

ना कोई जवाब
ना कोई बचाव
गहने सा साजये
चेहरे से छुपाएं

और दिन भर के बाद
दुनिया से भाग
जो आइना देखूँ
तो सामने पाऊँ

वो ही एक सवाल
खुद से दोहराते
ना कोई जवाब
फिर भी रहे “क्यूँ” !

बात

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बड़ा लम्बा सफ़र है
कुछ तो बात करो
समय को आज हरा दो
हमसफर तुम रहो
निगाहें दूर तक फेरीं
अजब से लोग दिखते हैं
निगाहें मूँद के मीता
करीब तुम रहो
काफिले कब रुकेंगे
पड़ाव बहुत हैं अभी
अलाव एक जला के
दो घड़ी को रुको
तुम्हारे फलसफे सुनके
होश में रह सकूँ
जिंदगी की कश्मकश से
मुझे सुकून दो