Monthly Archives: October 2015

चक्र

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सूरज देखा है उगता हुआ?
सुन्दरतम, शीतल अगन कुण्ड

ना ताप कोई, ना आँच कहीं
ना शीश चढ़े, ना दृष्टि जले

सिन्दूरी आभा से नहला
जग अंजुल जीवन सोम भरे

और दिन के सूरज को
कौन देख पाये?

प्रखर, ओजस, प्रज्ज्वलित
एकल धरा पर राज करे

ना नेह भर पाये कोई
ना ही कोई बिन छाया टिके

गर्वित अतितम ज्वाला दहके
जग घबरा, त्राहिमाम करे

प्रतिदिन संध्या का करे वरण
रवि अहम् अगन का क्षोम करे

और नयन मूँद, लज्जा पूरित
रात्रि ज्योति विहीन कटे

अनंत काल से सिखलाता
ये दान-मान के पाठ नित्य
मानव पर कब है सीख सके?

प्रगति पथ पर हो अग्रसर
मिट्टी सोने के भाव बिके

मनुज चढ़े जब सिंघासन
सूरज को भी पछाड़ दहके

घूमे नयति का सौम्य चक्र
जो ताप जले, वो रात ढले
जो ताप जले, वो रात ढले।

कोई बात चले

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शाम ढलने को चली, थक चले दिन के वो पल
एक धुन को है फिकर, कोई तो बोल मिलें

एक तस्वीर की रेखाएं कहीं सोच रहीं
फूल से कैसे चुरा, कोई तो रंग भरे

फिर कहीं दीप जले, और तन्हाई मिले
फिर कोई बात ना हो, और कोई बात चले…..

19-10-15