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कस्तूरी बचपन

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क्यों क्यों फिर फिर लौट के आती
यादों के झुरमुट में रूकती
बीती बातें , सौ सौगातें…..
कहीं बालपन फिर जी पाती ।।

छवि अपनी पे वारी वारी
पेहेन के माँ की छुप छुप साड़ी
भर भर हाथ चूड़ी खनकाती
बिंदी माथे सजा लजाती ।

खेल पुराने मीत पुराने
निश्चल दिन बीते; कब जाने
ओढ़े चादर समझ बूझ की
मन की नन्ही कली कुम्हलाती ।

गुड़िया के मिलने से पहले
दो मंजिल का महल बनाना
रात रात की नींद उड़ा के
उसकी लहेंगा चुनर सजाना ।

कब सोचा था खेल खेल में
रचते हम जीवन का मेला
दिन और रात जागेंगे जुग जुग
जीवन कोल्हू सम है खेला

धुरी घूमती समय फिसलता
जीवन का फलसफा बदलता
घड़ी सोचती रुक लूँ, बैठूं….
पल का लेकिन छोर ना मिलता

खेल वोही, परिणाम नए अब
अधरों के है गान नए अब
मुस्काते चेहरों के पीछे
नैना सजल, और कुछ रीते ।

खिलती शिखर में चांदी रेखा
माथे पे झुरमट सलवट का
छवि देख नैना मुस्काते
अब क्या भागें…क्या रुक पाते ।

गीतों के सुर में रस घुलता
इच्छाओं का बंधन खुलता
परमानंद अनुभूति में
आलौकिक दर्शन पट खुलता ।।।