Monthly Archives: March 2017

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ये जो कुछ इश्क़ सा

कितना नाकाम है

एक “saduuu” सा है दिल

बनता अनजान है

खोखली भी नहीं

दे सके दाद एक

और ग़ुस्से से ढक ली 

वो मुस्कान है
जो नज़र से छलक के 

बताती मुझे

राज़ जितना छिपा लो

जताती मुझे

तुम ख़फ़ा भी रहो

फिर भी हौले से आ

बैठती साथ, 

मुझपे मेहरबान है 
एक नन्हु सा साया

तेरे पास से

भाग आया है रहने 

मेरे साथ में

जेब में अपनी रख के

रहो घूमते

इस अकड़ पे भी क़ुर्बां

दिल-ओ-जान है !!!!!!!

बेरुख़ी ऐसी भी 

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खिलखिलाती हँसी एक उसे देख के

मुस्कुराती नज़र जाने क्या सोच के 

चलते चलते रुके रोज़ उस मोड़ पे

ख़त्म होते नहीं बातों के सिलसिले

.

उलटी जैसे चली रास्ता भूल के

बढ़ती है पर उमर जैसे घटती लगे

पर पहन उड़ चले कितने ही नख़रे 

और आँखों पलें अनगिनत सपने

.

है मुझे ही भरम रात तुम भी जगे,

और कोशिश किए, पल को थामा करे!

वक़्त को रोक कर सिर्फ़ मेरे लिए

रास्ते पे कहीं तुम भी क्या थे रुके??

.

कौन जाया करे इन ख़यालात पे?

ख़्वाब काफ़ी हसीन है, चलो जी चलें।

नाम कुछ भी नहीं, हश्र कुछ भी नहीं,

पानी पे पल दो पल के ये हैं बुलबुले

.

कल को खो जाएँगे, कुछ रुला के हमें

और याद आएँगे, दिन जो  हँसते गए

दिल ये गिनता रहे, खोयी जो धड़कनें 

जी लें तब तक ज़रा, ये जो कुछ इश्क़ सा !!!!

कुछ इश्क़ सा