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ख़ज़ाना

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सोच लिया अब तुमको दे दूँ

कहाँ संजो पाऊँगी

क्यूँ अब इनको रोज़ बिछा कर

यादें दुलराऊँगी

कभी अधूरे थे तुम लगते

मन में छाये जब थे

पूरा सा अब तुमको पाती

रूह समाए रहते !

ख़ज़ाना

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कुछ इश्क़ सा

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Revisiting the moments 🙂

कुछ इश्क़ सा

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याद है ?

वो पेड़ पे नाम उकेरते लोगों की

कितना आलोचना करते थे ।

और शाम की लम्बी-लम्बी सैर में

दुनिया को बदलने के हौसले भरते थे ।

वो गीत और ग़ज़ल गाते गुनगुनाते

कितनी कविताएँ रचते थे ।

और पत्थर पे रंग बिरंगे

अनेकों सपने रंगते थे ।

*

बचपना ही तो था

ख़ुद को मगर कम ना समझते थे ।

और हाँ , हा-हा-हा-हा…

कितना खुल के हंसते थे ।

साल बारहवें में जब मिले थे

क्या पता था यूँ घुल जाएँगे ।

और रास्ते जो बँटे तो ना सोचा

क्या फिर एक दिन मिल पाएँगे ।

*

बचपना ही तो था

बिना मोहब्बत के तकिया भिगोते थे ।

लम्बे-लम्बे पत्रों में

नित नए ख़्वाब संजोते थे ।

वो किताबों की आदर्शवादिता

कैसे लहु में बसते चली गयी –

और छोटी सी वो लड़कियाँ

पता ना चला कब प्रौढ़ा बन गयीं ।

*

कुछ वर्षों पहले कई साल बाद मिले

बड़ी भागी- भागी सी मुलाक़ात थी।

शादी, बच्चे, पुरानी यादों के बीच,

ताले से झांकती सपनों की तादाद थी ।

कहाँ बातें पूरी हो पायीं थी-

कितने सिरे छूटे रह गए थे ।

तब और अब में फ़र्क़ कैसा?

सिलसिले अब भी अधूरे से ही थे।

*

चाँदनी खिलती बालों में

आँखों की चमक सीली सीली सी थी।

तुम अब भी वो ही बच्ची सी लगी

संग तेरे फिर वो दिन मैं भी जी ही ली थी।

कितने ही फ़लसफ़े कहे और सुने

कितने ही क़िस्से बातों में बुने

“बस यही एक पल है गुज़र जाए ना”

सोच ये हर हसरत पूरी सी कर ही ली ।

*

वक़्त बहता चला, कुछ मगर चाल यूँ

दम भर में दिखा. और ओझल हुआ ।

दूर बैठीं हैं जो, पेड़ के नीचे दो

वो सहेलियाँ ही हैं, या परछाइयाँ?

फ़लसफ़े बुन रहीं, उम्र में ढल रहीं

उम्र पकती में और, बचपना भर रहीं,

थपथपा पीठ , कर हौसलों को बुलंद

जैसे कहतीं हो हँस के किसी लम्हे को-

भागते तुम रहे, और डटे हम रहे

लम्हे लम्हे में उमरों को जीते रहें

एक पल ही सही, कोई कम तो नहीं,

फिर मिलेंगे किसी दिन, ये वादा रहा !

फिर एक दिन मिलेंगे

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कितना कुछ देखे दो नैना

कितना कुछ सोखे दो नैना

फिर फिर लेकिन आँख मूँद ले

सोचें कुछ ना कहते नैना
!

चेहरे पे बढ़ती अब रेखा

नदानियों और तजुर्बों

का सब रखतीं लेखा-जोखा

शांत, मधुर मुस्काते नैना

नैनों ने कब छोड़ा कहना

पर सोचे अब किससे कहना

क़्या कहना और क्युकर कहना

बोलें पर ना बोलें नैना
!

बिन बोलों के प्रखर मुखर जो,

बोलें तब तो कितना बोलें

ना बोलें तब भी तो बोलें

सीखें ना चुप रहना नैना

।।।

कितना कुछ कहते दो नैना

कितना कुछ कहते दो नैना

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वक़्त बदल जाता है

कल जो मुझको दिखलाते थे

अपने पाँव का छाला

टीस पे मेरी एक पल भी ना

तूल उन्होंने डाला

चेहरा के पीछे का चेहरा

कौन समझ पाता है

वक़्त बदल जाता है

मोहित कौन भला रह पाए

एक रूप यौवन पे

इधर फिसलता, उधर मचलता

बस नहीं चंचल मन पे

जनम जन्मांतर के बंधन

कौन निभा पता है

वक़्त बदल जाता है

सुंदरता की उमर में फिरते

आगे पीछे भँवरें

और फिसलती उमर में कोशिश

मन सुंदरता संवरे

क्या तन, मन दोनो के तेजस

कोई बचा पता है ?

वक़्त बदल जाता है

भगवन रूप बदलता रहता

भक्त गणों के मन में

दिन फिरते से रूप बदलता

पूजा और प्रवचन में

इंसान को क्या हासिल जो

ईश्वर ना पा पाता है

वक़्त बदल जाता है

!

वक़्त बदल जाता है

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पहली दफ़ा

गज भर की साड़ी पहनी थी

स्कूल की फ़ेयरवल पार्टी में..

वो साड़ी थी ..

आज़ादी की उड़ान

ख़ुद की इच्छा से बाँधी साड़ी

पाँव फँसा तो सबने कहा,

“ज़रा सम्भलकर”…

फिर पहनी ..

गज भर की साड़ी शादी के बाद

इस दफ़ा साड़ी को मैंने नहीं

साड़ी ने मुझे बाँधा..

आज़ादी की उड़ान

ज़मीं पर रोक दी गई

पाँव फँसा तो सबने कहा,

“इतना भी नहीं सम्भाल सकती”..

फ़क़त एक कपड़ा ही तो था

बस मायने बदल गए

वक़्त के साथ…!!

मायने फिर बदलने की ठानी

एक बार फिर से बांधी

अपनी इच्छा से साड़ी

और रूख किया office का

पाँव फिर फँसा तो सबने देखा

किसी ने सम्भालने को कहा

किसी ने टोका

किसी ने शक से घूरा

और किसी ने तो हसरत से

लेकिन इस बार मन नहीं बँधा

ना सपनों में

ना रिश्तों में

ना हसरतों में

ना बेड़ियों में

यही उड़ान थी

आसमान में पंख पसारे

उड़ते हुए

दूर दिखते हैं सभी

किसने क्या कहा

क्या पता

पंख मेरे हैं

मेरी ही उड़ान

साँस मेरी

और मेरी ही जान

जब तक दम है

जोश है

उड़ते जाना है

मंज़िल सोची नहीं

सफ़र का लुत्फ़ उठाना है ।

बंधन मोह है

तोड़ना है

चलते जाना है ।

जब तक दम है

जोश है

उड़ते जाना है।

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Unending trail of raindrops

Flow on my window pane

Etching memories

*

Memories of the racing days

The race of raindrops that we played

On way to school

On a rainy day

Whether won or lost

It was giggles all the way

*

Memories of the dreamy days

The rains prisoned the outdoor strolls

When girls then ganged up all indoors

Got dressed and draped

And cooked and ate

It was giggles all the day

*

Memories of romantic days

The drops on pane when etched a name

Was seen by none , was written nor wiped

Yet skipped a beat, the heart would sing

A song not heard

A tune so new

It was smiles for weeks and days

*

Memories of the long pause

When the raindrops failed to cease

And the hands of pals so close

In a blink, waved to leave

Sitting by the window pane

Trails of drops but wouldn’t leave

Into years meta-morphed those days

*

Unending trails of raindrops

Trail on my window pane

Etching memories

A racing here

A dreaming there

A pause stepping in from nowhere

A name here and there

Everywhere

The drops are same

The meanings changed

Merging also with drops saline

The smile are drenched

In love with rains

If only reflections brought back the days !

Raindrops

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बटुए में भरी है

अरसे से पड़ी है

आते जाते नोटों को

देख डाह भरी है

लहू जुड़े रिश्तों के

नोट सम रूप पर

मिटी नहीं कभी किंतु

बिखर आज अड़ी है

*

चिल्लर से जमा हुए

किसी किसी राह मिले

हाथ कभी थाम और

कभी हाथ छुड़ा चले

टुकड़े के रिश्ते भी

जनम से ही करम-जले

जवाँ हुए मचल मचल

उम्र के पड़ाव छले

*

छुटपुट से दोस्तों की

अल्हड़ सी यारी की

आँखों की चोरी की

इश्क़ की ख़ुमारी की

उतरे ना एक चढ़ी

ऐसी बीमारी की

नोट शांत जीते है

चीख़ रेज़गारी की

*

भारी इस तरह हुआ

बटुआ ने शोर किया

संभल रखे नोट और

खिसका चिल्लर को दिया

इधर भटक, उधर सिसक

अटक-अटक प्रश्न किया

चिल्लर के साथ बँधे

मन ने विद्रोह किया

*

नोटों का मान करे

झूठा गुमान करे

कैसे ये नियम भला

क्या इनसे बात फले?

चिल्लर जो छिटक-चटक

गफ़लत में साथ चले

नोटों से लाख भली

ऐशों ही में जो चले

*

फिर भी ये चिल्लर क्यू

बटुए को भार लगे

कैसा ये रिश्ता जो

नोटों के साथ फले

एक पल भर साथ जिया

जन्मों को बाँध लिया

चिल्लर से प्यार और

चिल्लर ही झाड़ चले ?

मन तब उदास ठिठक

एक तस्वीर उठा

आँखों में पाल रहा

रोज़ रेज़गारी है !!!

रिश्तों की चिल्लर

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तुम जाना जब

थोड़ा सा रह भी जाना

यहीं कहीं बगिया में

कि ये झूले की शाम

रोज़ एक चाय के संग

याद करेगी तुमको

तुम जाओ जब

थोड़ा सा रह भी जाना

रुके रुके से यहीं

कि ये घर की ड्योढ़ी

तुम्हारे क़दमों की चाल

को याद किया करेगी

तुम जाओ जब

थोड़ा सा रह भी जाना

मेज़ पे झुके झुके

कि ये कलम तुम्हारी

दावत से बढ़कर

याद करेगी तुमको

तुम जाओ जब

थोड़ा सा रह भी जाना

यहीं जगह जगह पर

कि ये ख़ुशबू तुम्हारी

कि ये बातें तुम्हारी

कि ये अख़बार के पल

कि ये पकवान सारे

कि ये radio के गाने

कि ये TV की ख़बरें

कि ये लाखों बहाने

सब कहते हैं तुमसे

बिन बोले मेरे भी

कुछ मेरे लिए ही – थोड़ा सा रह भी जाना

सुनो

तुम जाना जब

कभी पूरा ना जाना !

From archives 🙂

तुम जाना जब

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कहाँ तब बूझ पायी

जो आते तुम रहा करते थे अक्सर

परिंदे की तरह

मेरे आँगन में सुस्ता के पलक भर को

उड़े जाते थे जाने कौन अम्बर को

समझ जो तब ये पाती

अनेकों आसमानों से उतरकर

जो दम भर कभी आते पलटकर

मेरे दर ही ठहरते हो

मेरे हो दोस्त-दिलबर

समझ तब जो ये पाती

की ख़ुश्बू से तुम्हारी जो

महकता रहता मन-आँगन

पास ही हो कहीं तुम

कि रहकर दूर भी

फिर फिर गुज़रते पास से तुम

मुझे यूँ याद करते

मेरे हो दोस्त-दिलबर

की तब जो जान पाती

गिलहरी की तरह आते फुदकते

ना कोई रोके-टोके

कब आए कब गए तुम

रुके या ना रुके तुम

ये हक़ यूँ ही नहीं जताया जाता

मुझे तुम मानते हो

मेरे तुम दोस्त-दिलबर

कि तब जो जान पाती

ना खटकना किवाड़

ना ही मेरा नाम कहना

चले आना बताए बिन

कभी भी आना जाना

वो अपनापन तुम्हारा था

मेरे तुम दोस्त-दिलबर

समझ आया अभी जब

आए ना वापस पलटकर

मुझी से रूठकर तुम

कि सूना है तुम्हारे बिन

वो झूला, वो चटायी

वो चाय , रस मलाई

गए तुम ऐसे मुझको ले गए हो

थोड़ा सा साथ अपने

थोड़ा सा रह गए भी

तुम ज़रा पास मेरे

कि हो पाए अलग कभी ना पूरे

मेरे तुम दोस्त – दिलबर

तब और अब की दोस्ती