Monthly Archives: October 2018

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कितनी बाक़ी है कितनी बीत गयी क्या मालूम

हम जहाँ रुक गए थे वक़्त वहीं है अब तक !

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Knock knock

Says November

Peeping through

The last few days of October’s colours

When the mornings wrap

The misty scarf

And sun lowers

The degrees of its hearth

To no more melt and charr the breath

But gently nudge and call out kids

To lazily lie or happily play

In the welcome warmth of the Sunday.

So gently the noon cascades to dusk

While flirting with the drapes to its best

The breeze is fragrant as the musk!

Warms the heart though

But it’s nip in the air

And I wish to wrap

A shawl with care

And stand just there

And stand just there !

.

Overlooking the garden, watering the greens

Tendering my spirits as also the earth

That Allows mushrooming here and there

The saplings from deep lying roots,

The memories from deep rooted thoughts ,

Opening the doors,

ready and welcoming !

And there it’s found

It’s all around,

Right at the door,

Ready to walk in

The winter like

A dust of cloud

Encountered wandering

o’er the hill

Loaded with drops,

loaded with chill

engulfing as

one walks on the ridge

Moistening not eyes

and yet the eyes

Warming the heart

with winter chill

Smiling ;

another one sets in!

.

The leaves of my October are yet to fall

And blooms of spring too far for call

Catching me unaware

Unprepared, withdrawn

The hot turns warm and warm goes cool

The warm and cool stay, pause and hold

The nights grow longer

To call for cold

To let the cold one day walk in

November sets

The stage for all

October packs the unwilling bags,

Spontaneous a smile

Curves over my frowns

I open to embrace

The winter that peeps in !

Announcing winters

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एक रावण मेरे मन में रह

प्रतिदिन मन की सीता हरता

करे प्रताड़ित मुस्कानों को

नयनों की निश्छलता छलता

मन नगरी की विस्त्रितता में

क्यू है एक नन्ही सी लंका?

मुझको सुख से रहपाने को

है पर्याप्य तनिक भर कुटिया

व्यापक ये साम्राज्य संभालूँ;

किस काँधे ये बोझ उठा लूँ;

किसको सौंपूँ राज्यभार और

किस किस को मन्त्री बना लूँ

राजन राम कहाँ अब पाऊँ

कहाँ खोज हनुमन अब लाऊँ

जो फिर से विध्वंस मचा ले

लंका से लंकेश मिटा ले

मैं ही सीता, मैं ही रावण

मैं ही कलुषित, मैं ही पावन

मन ही लंका , मन ही अजुध्या

नयन ज्योत में दर्शन क्षुब्धा

अश्रु नीर से चरण पखारूँ

राम भजूँ दिन रैन निखरूँ

व्रत तप धारण से ये आशा

मन में जब जब उठे वीपाशा

हे राजन इतना भर वर दो

रावण पर सीता प्रबल कर दो

रावण पर सीता प्रबल कर दो !!

extrapolating the lines to embrace the yin and yang, I would also add :

तुम ही राजा राम रूप

और तुम ही मन में रावण छवि भी

तुम ही दर्शन क्षुब्ध लालसा

तुम ही पूजन की परिधि भी

पन्नो की तह में जो संचित

जौ के पौधों के जैसे तुम

सुख की आस, और विश्वास ,

मन मंदिर की ज्योत सकल तुम

क्षण भर को कहने के रावण

दिन दिगम्बर राम रूप तुम

🙂

विजयदशमी

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Beyond my silence

And over my death

The possessions shall wither

And memories will fade

The tears shall dry up

Forgotten will b pain

.

Remaining to breathe

I’ll leave back

The words

The etching from my pen;

All the silent verses

that stay more alive

than the leaves during the fall !

Words

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In this era of texts

And online proposals

Chats catching up fancies

And virtual dating ;

I fancy the retro

The knee down proposal

Yearn for roses in scarlet

Eye looking into mine

Promises that stay

Not hidden from the world

Not scared of being exposed

Not scribbled and deleted

Not woken to mundane

Or lost to desire for a change

So there’s a prince charming

Who will tenderly hold

And walk by me through thick and thin

What if no rings exchanged

The paths may diverge

The rules shall still stay same

Holding on to the belief

You only love once

Whether or not you win it

The once is the life’s worth !

Rewind

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https://www.facebook.com/100000640579008/posts/2052763854754947/

ईलाज़-ए-दर्द-ए-दिल जो करना चाहें हो भी जाएगा

ये दिल लेकिन तेरी ख़ुशबू से बेज़ा हो नहीं सकता

जो जीने का नशा है डूब के ग़म-ए-मोहब्बत में

किसी को कैसे समझाएँ, बायाँ ये हो नहीं सकता

ख़िलाफ़त-ए-ज़हां क़ुबूल है, मंज़ूर मायूसी

ख़िलाफ़त चाहतों से हो, मगर ये हो नहीं सकता

उन्हें ख़ुद पे ग़ुरूर होगा, हमें ख़ुद पे यक़ीं इतना

कि उन सा है ना कोई, हम सा कोई हो नहीं सकता !

फ़क़त दीवानगी कह के ना हँस देना जहाँ वालों

जिगर मुझसा ले के जी लो ये तुमसे हो नहीं सकता

And frm shin-

Jo doobe hai mohhabbat me…wahi us paar utrenge

Yakin hai aashiko ka ye to jhootha ho nahi sakta

😇

ईलाज़-ए-दर्द-ए-दिल

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तेरे जैसा ही कोई ढूँढती हूँ

कहीं मिलता नहीं है!

ना वो लम्हे

ना वो जज़्बा ,

ना वो आँसू,

ना वो ख़ुशियाँ,

झगड़ना और मान जाना,

बिना रूठे रूठ जाना,

फ़िदा तुझ पे,

हैरां होना ;

बुत को तेरी

खुदा माना

कहाँ खोए

कहाँ फिसले?

साथ ही था

चलते जाना ।

अकेले दिल मेरा लगता नहीं है।

तेरे जैसा कोई मिलता नहीं है !

तेरे जैसा भी कैसे ढूँढ लूँ अब ?

तुम भी तो तुम से

अब कुछ कुछ नहीं हो ।

तेरे जैसा भी कैसे मुझको मिलता ?

मैं भी अब मैं के जैसी ना रही हूँ ।

अजनबी से तेरे और मेरे मैं में

और कभी भीड़ में रस्मों-जहां की,

तेरे जैसा ही फिर भी ढूँढती हूँ ।

साथ तेरे ही कब से चल रही हूँ।

तेरे जैसा

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बस एक लम्हे का झगड़ा था

और लम्हा अटक के रह गया।

ना राह बढ़ी, ना राह मुड़ी,

उस लम्हे में जीते जीते

कितने लम्हे क़ुर्बान हुए ;

कितनी मुसकाने डूब गयीं

आश्क़ों के रोज़ समुन्दर में,

कितने नग़मे धुन भूल गए ,

कितने लब बेज़ुबान हुए ।

वो लम्हा इस लायक़ ना था-

वजूद कोई, ना कोई कशिश,

नफ़रत से भरे उस लम्हे के

हम क्यूकर मगर ग़ुलाम हुए ?

सन्नाटे हँसते रहते हैं

यादों के दरीचे सजते हैं

यारों के जमघट में जब जब

लमहों के क़िस्से चलते हैं

जीते भी हैं, मरते भी हैं,

हम रुके हुए चलते भी हैं ;

और एक अकेली रूह कहीं

लाशें ढोती, सिसकती है

बस एक लम्हे के झगड़े में

कितने तो क़त्ल-ए-आम हुए !!!!

गुलज़ारगिरी : “बस एक लम्हे का…”