Category Archives: Friendship

अधूरी सारी बातें

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रात आधा चाँद मुझको ताकता है
और आधा जाम आँखों में घुला है

बोल आधे ही घुले से बात में हैं
नैन आधे ही खुले, कुछ ख्वाब में हैं

चल दिए कुछ दूर तक धीरे से बादल
और आधी दूर जाके क्यों रुके हैं

रात रानी की महक आधी उड़ी सी
और कुछ फूलों में बस के रह गयी सी

थाम के तुम चल रहे हो हाथ मेरा
सब अधूरा, पूरा बस एक साथ तेरा!

है बड़ी ही खूबसूरत सी, अधूरी सारी बातें
रह रहीं हैं संग हमारे, गुन गुन गुनगुनाते-

चाँद मेरी खिड़की में से झांकता सा
बादलों का जिसपे पर्दा सा गिरा है

रात रानी खुशबुएँ बिखेरती सी
गुलदान में खड़ी शरमा रही सी

रोज़ ही एक ख्वाब बनता है कहीं पे
हाथ तेरे ख्वाब मेरे पालते हैं

है बड़ी ही खूबसूरत सी, अधूरी सारी बातें
रह रहीं हैं संग हमारे, गुन गुन गुनगुनाते

थाम के तुम चल रहे हो हाथ मेरा
सब अधूरा, पूरा बस एक साथ तेरा!!!

चिट्ठी

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लिखने बैठे जो पाती तुझको
शब्द इतने समेटे ना सिमटे
कोई जतन ना काम जब आया
झिलमिलाती सियाही ले आई
और शब्दों को पंख पहना कर
भेज आई चंद्रमा के पास !

आज की रात देखना ऊपर
कुछ जियादा ही सितारे होंगें ।।

In memory of letter writing days…as posted to Alka !
🙂

दोस्ती

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चलते आये है युगों से
दूरियां तय की बड़ी
थे घने जंगल मगर
छाँव भी तो थी घनी
ना कभी महसूस होई
कुछ थकान सी कहीं
ना कभी पाया अकेला
राह में खुद को कभी
झरने मीठे गुनगुनाते
प्यास लगती जिस घडी
दोस्तों ने इस तरह
हमसे निभायी दोस्ती
पाँव जब कांटे चुभे
मलहम बना लाते हँसी
दावतें दे बांटते गम
और बढ़ा जाते ख़ुशी
उम्र बढ़ती दम सिकुड़ता
फ़िक्र चढ़ती ना कोई
हाथ ये जो हाथ तेरे
हौसले घटते नहीं ।

ख़फ़ा

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ये जो सुन लेते हो तुम हर लम्हा
बिन कहे धड़कनें सभी मेरी
और धीमे से फुसफुसाते हो-
ना जाने कितनी अनकही वो तेरी
अब जो मुझसे करें है बात कभी
मैं झिड़क के उन्हें चल देती हूँ ।

जो मिल जाए कहीं नज़र मेरी
तुम्हे बता देंगी-
आज कितने ख़फ़ा हैं तुमसे हम !

राह

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एक अनजानी डगर पे कभी चलते चलते
कोई एक चौरस्ता जाना पहचाना लगे
तो रुक जातें हैं कदम
ढूँढने को कोई पगडंडी
जहां की ना हो अनजान सी रहगुज़र
रुके रुके से कदम
छानतें हैं हर चेहरा
ना जाने किस की हँसीं मेरी हँसीं से मिले
गुदगुदाए फिर से
फिर कोई बात चले
सुन के नज़रों से,
आवाज़ से देखूं मैं उसे
हौले से छू के दिल से दिल की बात करूँ
लबों की चुप मचल उठे
रोम रोम से बहे
बन के मुस्कानें कई
जी उठेंगे जो सो चुकें एहसास
उम्र रुक जायेगी
कोई तो ऐसी राह मिले !

With credits to the poem by John White posted on his blog “Double U” ….Learn! The words touched deeply and kept haunting me. Using a translated fraction here but let me admit, the original is marvellous.

“जीवन-रेखा”

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किच-किच की बिमारी
जब से गले लगाई
चाहे ना चाहे
हर दिन एक लड़ाई

आज छोड़ा वो कोना
आज जला भगोना
डूब ही जाता दिल फिर-
आज देर से आई ।

गुस्सा सब छिपाया
तोहफे का मलहम लगाया
ठोके उनको सलामी
अतिथि की खबर जो आई

हुई काम में बदली
छोड़ चले हम दिल्ली
लंदन या शंघाई
रंगत उन्ही की छायी

लाख रुपैये कमा लो
पुर्जे लाख लगा लो
घर में फिर भी जपोगे
“जय-जय काम वाली बाई”।

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For a friend recently posted abroad whose “kaam waali baai” didnt turn up today 😉

खूबसूरती

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तुम कहते रहे और मैं सुनती रही
एक एक परत पल पल छिलती रही
मेरे इर्द गिर्द बने चक्रव्यूह सभी
तेरी बातों से, निगाहों से
छिन्न भिन्न हों, बिखरते रहें
मन मूरत अश्रुजल से धुलती रही

सुनाई दिए भी मगर कुछ नही भी
दिखाई दिए ना, नज़र धुंधलाई
मगर दिख रही थी बस एक छवि तेरी
जो सब परतें खोल, बस आज थी मेरी

लिए आगोश में आज मेरे कलुष भी
था चाहा मेरे मय को जैसे अभीतक
उसी ऊष्म प्रीत की बांधे डोरी
बंधीं और साँसें यूँ तेरी और मेरी

कहीं दूर से आती तेरी आवाज़ें
वो झिड़की,
वो नफरत से रिसती मोहब्बत
वो वेहशीपने में तेरा झुंझुलाना
विवशता की चोटें मेरे मन से पाना

था इतना कभी क्यों तुझे ना निहारा
मेरे मीता मुझको जगत से तू प्यारा
मेरे मन की अग्नि की नेहों से वृष्टि
बने तप के कुंदन तेरी खूबसूरती ।।

CCD

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यहाँ आकर तुम्हारी याद आये ना
ये मुश्किल है

मैं अपने साथ बैठी हूँ
कितने लम्हों की भीड़ है-
कोई कुछ बात करता है
कोई रोता मचलता है

है एक लम्हा जो खींचे हाथ
मुझको लेके चलता है
उसी कोने की कुर्सी पे
जहाँ हम थे कभी बैठे

अभी भी आँख में झांके
वो लम्हा तुम सा लगता है
तुम्हारे जैसे बिन बोले
निरंतर बात करता है

एक लम्हा रुका है मुड़ के
रस्ते पे किसी घर में
जहाँ की नीली दीवारें
अभी भी ताज़ी है मन में

कहीं मंदिर की घंटी दूर बजती
मुझको ले जातीं
तुझे कितना था पाया पास
ये एहसास कराती

मचलते है ये सब लम्हे
कि फिर से तुम को बुला लूँ
कोई गुनाह तो नहीं
क्यों फिर तुम को भुला दूँ?

छुड़ा के हाथ घबरा के
भागता है अकेला मन
थके से कदम बढ़ते है
कुचल के कल का पागलपन

नहीं है स्वाद इसमें
पर मैं कड़वे घूंठ भरती हूँ
मुझे अब याद ना आओ
यही मनुहार करती हूँ ।