Monthly Archives: December 2015

धुन

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धीरे से कहती हूँ
कानों में गुनगुन मैं
जिसपे तुम मुस्काओ
थोड़ा सा थम जाओ
दम भर मुड़ के देखो
यूँ ही गुनगुनाओ
रिश्तों के परचम् में
अहम के मधुवन में
जीवन के मरुस्थल में
कर्मों के रणस्थल में
रह जाए होठों पे
कह जाए नयनों से
ह्रदय को छू कर के
स्पंदित हो पल पल में
सरगम की सप्तम में
धुन वो सबसे मीठी !!

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कौन कब कहाँ मिले
किससे रिश्ता क्या जुड़े
क्या पता, क्यों भला,
दूर कितने संग चले …..

Glad to connect with Shipra !
26.12.15

टुकड़ियाँ

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जो शब्-ओ-शाम ही देखा तुम्हे करतें रहतीं
वो निगाहें देखने को तुम्हे पल पल तरसें

हुई मुद्दत ना हुई तुमसे कोई बात, मुलाक़ात
रोज़ ही तुमसे मिलें हैं, रोज़ ही बात करें

भूल तुमको गयें हो ये तो गंवारा ही नहीं
याद करते नहीं गोया की याद तुम भी करो

ख्वाइशें और भी हैं जो ना जुबां बोल सके
बंद आँखें जो करो, फिर मेरी नज़रें पढ़ लो

देखते रहते हैं मुड़के कि जहां तुम थे खड़े
फिर पुकारा करें तुमको याद मर मर के जीये

चले जाता है आज थामे हुए हाथ तेरा
कभी एक वक़्त सुकूं था बसा बस दिल में मेरे

कहे से और भी बढ़ती चली जाती है खलिश
कभी जाना भी हो तो अलविदा ना कहना हमें!

कई दिन की उदासियाँ उम्मीदें कर रहीं रौशन
थकी जातीं थीं नज़रें, शुक्र-ए-रब, दीदार तो होगा !

हमें भूल के तुम रह पाओगे क्या
कि बातों में मेरे फ़साने चलेंगे

लबों पे आज तालें हैं
निगाहें बंद पर्दे में
फिर भी हैं सिलसिले
गुपचुप झाँकने के,गुफ्तगू के

बड़ा गुरूर है खुदपे तुमको
जवाब हर गुरूर का हूँ मैं !!

न देखूं तुमको तो दिन कुछ अधूरा ही सा लगता है
जो देखूं भी, मगर पूरा सा तो होता नहीं लेकिन !

थोड़ी सी ख़ता की इज़ाज़त जो बक्शी है
बेहिसाब नेयमातें इस ख़ता में बसतीं हैं

काश नाराज़गी ही होती इस बेरुखी पे
बात करते नहीं लेकिन, बात करते भी तो हो

हसरतें यूँ भी कभी खेल किया करती है
चाह ये भी कि मयस्सर हो कोई बात करो तुम!

मदहोशियाँ भी, होश भी बहके ना मगर
जाम पे जाम यूँ नज़रों से पिलाओ हमें तुम

क़त्ल होना किसे कहते हैं जाना ये क़त्ल होके
बेबसी के सभी आलम देखते हैं रोज़ जी के

कहीं दीदार की चाहत, कहीं है यार से निसबत
जिधर देखो किसी ताबीज़ से कुछ हसरतें पलतीं !!!!!!

बड़ी बेअदबी से दे डाला तमगा बेसउर का
ये तो कुछ भी नही, हम जाम-ए-जिंदगी पे रखते होठ !

लफ़्ज़ों को बाँध पाये
कब इतनी कुवत हममें
जब भी हुए अकेले
कुछ शब्द बने साथी !

गुज़र रहे थे यूँ ही हम पुरानी राहों से
चंद चेहरे पुराने देख के गुलज़ार हुआ दिल !
इन्ही की सोहबात में कई बदमाशियां सीखी
इन्ही की गालियों में गूंजते  ठहाके गले मिल

जान लेके किसी की जिंदगी पायी जो अगर
जान क्या ख़ाक कभी फक्र से जी पायेगी !

जिसे देखा निगाहें मूँद के, दिल से सुना किया
उनके परदे में होने से भला हमको फरक कैसा !!!!

तमाम बचपन भागते समझ के पीछे रहे
जिंदगी की समझ आई तो बचपन याद आता है

कभी नाराज़ होने की तमन्ना जब भी उठती है
सिहर जाते है कि गर ना मनाया तुमने, क्या होगा !

बड़ा सुकून है आज की इस बेकरारी में
कि अश्क़ भी है, मुस्कराहट भी खुमारी में

बात सबसे किया करते, खफा एक हमसे ही हैं
दोस्ती उनके निभाने का हुनर अच्छा है !

तुमने कब खायी थीं क़समें कोई;
कभी वादे ना किये ।
तुमसे शिकवा ना शिकायत कोई-
हम ही दुनिया में तेरी, बिन इज़ाज़त के जिए!

गुस्सा भी है, गुरूर भी
कुछ आप ले नहीं पाये
कुछ आप ही ने दिया भी !!

Gulzar…..love forever !

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Tere utare huye din…Tange hei lawn men aab tak…Naa woh purane huye hain  naa unka rang utra…Kahin se koi bhi siwan abhi nahin udhdi…Elaichi ke bahut pass rakhe pathar par zarasi jaldi sarak aaya karti he chhaonv …Zarasa aur Ghana Ho Gaya he woh paudha…Mein thoda thoda eih gamla hatata rahta hoon…fakira ab bhi wohin meri coffee 🍵 deta he…Gilhheriyon ko bula kar khilata hoon biscuit 🍪…Gilheriyan mujhe shaq Ki nazar se dekhti hen …wih tere haathon ka mus janti hongi…Kabhi kabhi jab utarti he cheel sham Ki chhat se.thaki thaki si… Zara der lawn Mein ruk kar … Safed aur gulabi mausundo ke paudhon Mein ghulne lagti he…Ke jese barf ka tukda pighalta  jaye whisky Mein…Mein scarf din  ka gale se utar deta hoon…Tere utare hue din pehen ke ab bhi Mein  Teri mahak Mein Kai Roz kaat deta hoon…Tere utare hue din tangen hen lawan Mein ab tak…

दिन ढल जाते हैं
रातें भी कट ही जातीं हैं
तेरे एहसास से बेसुध सी एक साँस कहीं
अनगिनत साँसों के संग घुली जीती जाती है
जिंदगी गुज़र भी रही है
खूबसूरत भी तो है
और शायद नहीं ये कशिश होती,
एक ख़लिश सी जो है
वो नहीं होती,
इस ख़ुशी का एहसास कुछ कम सा होता
साथ तेरे ये सफ़र शायद कम हसीं होता
साथ तेरे ये सफ़र शायद कम हसीं होता !!!!!!

🙂

रेत

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रेत की फितरत है बह जाना-
ना बंद मुठ्ठी थम पाये
ना खुली हथेली जम पाये।

रेत के मानिंद भी हो तुम थोड़ा;
और थोड़ा नहीं भी……

रोज़ थोड़ा बंद करती मैं हथेली
खोलती थोड़ा कभी….
रोज़ खाकर एक कसम हँसकर यहीं
तोड़ती झकमारकर जैसे …..यहीं !!

शब्द खुलकर नृत्य करते भी यहीं
और चुप के काफ़िले बसते यहीं
जाने कैसी डोर से बांधे मुझे
हक़ नहीं, और फिर भी करती हठ यहीं !

होश

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गफलतों में तो मुकम्मल ही था
दिन चढ़े, खुली आँख खो बैठे
दोष दें भी तो हम किसे दे दें
एक होश ही ना संभाल सके !

………hunted out from
Archives

A little, A life

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From where the dreams are formed
From where the smiles arise
From those still and silent nights
To the beginnings of daylight
Full of rustle bustle of life,
That puts the dreams to sleep
That turns the curves straight
And makes the smiles all fake…….
There lies  a sandwiched horizon –
Making the dreams turn true
Holding the little hands of smiles
On the sails of hopes they ride……
Between each day and night,
A little, a life is lived !

समझदारी

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छोड़ दिया ज़िद करना मैंने
गीत वो अल्हड कैसे गा लूँ
जिम्मेदारी की परचम पे
आस के झंडे क्या फेहरा लूँ
बचपन की वो शोखी छूटी
समझ का पक्का भार उठा लूँ
सपनों में होता है अब तो
मैं रूठूँ , तुम मुझे मना लो ।

Scribbles

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She writes

She write, she writes
she writes, she writes, she writes
Then she writes and she dont write, and she writes but she dont write
The words are born, the words are lost, in her sobs, tears and sighs
And she writes, and she writes, she writes, she writes, she writes!

A happy note, a crispy bite, a chirpy song, blooming delight
The spring in steps, the rising sun, she would all lovely describe
A catastrophe, a gloomy night, a lonely bird, unpleasant sight
And she writes, and she writes, she writes, she writes, she writes

Disheartened but, rejected when, dejected when, she picks a fight
And then she writes, and she dont write,
And the words born then loose life
Revolting thus, protesting thus, alone, with all her might
To thou she writes, and then dont write, she writes, she writes, she writes !