Monthly Archives: November 2015

समर्पण

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हरी तुम जीते
और मन हारा
युग युग हठ की देखी क्रीड़ा
कभी स्वयं का, कभी तुम्हारा
युग युग हर करनी को तुम्हारी
मान चुनौती एक, स्वीकारा
युद्ध प्रखर कर, सर ना झुका कर
प्रतिपल तुम को था ललकारा
हँसते और नव लीला रचते
देख तुम्हे, था डाह ने मारा
थकते हैं अब अस्त्र लिए कर
आद्युत से चुंधिया रहे नयन
डारूँ चरणों शस्त्र समस्त
करूँ वरण हरी, नाम तुम्हारा
हरी तुम जीते
और मन हारा  !

एक बार और

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एक बार और सही
बात तो है ना नयी
ज़ज़्बा लेकिन है नया
दिल भी कुछ मचल गया
थाम के ज़िद है अड़ा
फिर उसी राह खड़ा
तुमको चुनौती बड़ी
आस भी राह खड़ी
जीते गर तुम तो भी
हारे गर तुम तो भी
तेरे संग जीत मेरी
तेरे संग हार मेरी !!!!!!

Bokaro Diaries

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hua aagman bokaro prangan ……

baal meet yaadon mei aate
khel puraane man muskaate
pathar,ped,raaste,chehre…
kuch kuch yaad dila gudgudaate

need badi hai meethi aati
nayan naval raunak itraati
chalo dwar sabhi khatkaayein
thodi yaadein nayi rachaayein

milen shaam ko bandhu jan se
haal puch kuch hanse hansaayein
dhalte yauvan ke parcham pe
bachpan ke jhande lehraayein

on behalf of “Boss”
10/11/15

An old love

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Ghazal by Jigar Moradabadi –
——————-
Allah agar taufiq na de insan ke bas ka kaam nahin
Faizan-e-mohabbat(grace of love) aam sahi Irfan-e-mohabbat(enlightenment of love) aam nahin

Ye tu ne kaha kya aye nadan fayyazi-e-qudrat(generosity of nature) aam nahin
Tu fikr o nazar to paida kar kya chiz hai jo inaam nahin

Ya rab ye maqam-e-ishq hai kya go diida(sight) o dil nakaam nahin
Taskin(comfort) hai aur Taskin nahi aram hai aur aram nahin

Kyuun mast-e-sharab-e-aisho-tarab taklif-e-tavajjoh(intoxicated by wine exciting joy; mirth, cheerfulness, hilarity) farmayen
Awaz-e-shikast-e-dil(sound of breaking of the heart) hi to hai awaz-e-shikast-e-jaam(sound of breaking goblet) nahin

Aana hai jo bazm-e-jaanan(assembly of beloved )  mein pindar-e-khudi(arrogance/pride of ego) ko tod ke aa
Aye hosh o khirad(reason, rationality) ke deewane yaan(here) hosh o khirad ka kaam nahin

Zahid(devotee,hermit, religious devout) ne kuchh is andaz se pee saaqi ki nigahen padne lagin
Maikash(drinker) yahin ab tak samjhe they shaaista(polite, gentle) daur-e-jaam(round of wine drinking) nahin

Ishq aur gawara khud kar le be-shart(unconditional) shikast-e-faash(clear-defeat) apni
Dil ki bhi kuchh un ke saazish hai tanha ye nazar ka kaam nahin

Sab jisko asiri(captivity,Imprisonment) kahte wo to hai to amiri hee lekin
Wo kaun si azadi hai yahan jo aap khud apna daam nahin…

Cooking – A celebration!

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The chimney waited daily
For the riot of aromas
The palette of spices
Held on to the shelf with pride
And the apron witnessed
The gastronomic delights
Shaping up from a dough
Shredded into fine chops
Soaked overnight some
Marinated, the others
Brewed, baked, braised…
Each one a masterpiece
Of the heart behind the hands……
And went on and on and on
Daily, religiously-
The chef’s preparations
Stretching-
From the grocery shop
To the kitchen
From the dishes
To the cutlery
A table done up beautifully
A cherry inviting the lips
Smoky fumes
Delighting the eyes
And the tiny belly
Exuding satisfied expansion
Was the trophy
For the perfect celebration!

बागी

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एक कलम है ये रोग की मारी
जिसपे है ज़िद की बंदिशे सारी
शब्द है मचलते बहने के लिए
एक कसम रोकती है, होठ सिये

दिल ये बैठा हुआ खफा सा है!
कोई ना आ के क्यों मनाता है?
रोज़ गुस्से के गर्म घूंठ पियें
हम तो बैठे हुए थे मान किये

किसी क़ाज़ी ने कुछ कहा हमसे
दिल ने बागी बना दिया फिर से
मुस्कुरा के, सभी क़समें तोड़े
मन संग तूलिका ये फिर से जिए

कभी यूँ भी तो हो

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जिस राह पे चलते
रोज़ पलटते
मुड़ मुड़ देखें
रुकते थकते
कुछ धीमे हो
आगे बढ़ते
थामे राह का मोह
सिहरते
कल की आशाओं से बंधते
और आशंकाओं से डरते

राह कभी वो
याद हमें कर
मुड़ के देखे,
आँचल थामे,
एक पल रोके;
रूठे हम जो,
हमें मना ले
एक तृप्ति सी
ह्रदय समा ले

मोह पे अपने
नाज़ रहेगा
राह पे बढ़ना
नहीं खलेगा
पहने चाह का ताज चलेंगे
पैंरों को भी पंख मिलेंगे….

बंधन

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खोना क्या और पा लेना क्या
रे मन, इस बंधन को तोड़ो;
क्या कुछ हारा, क्या कुछ जीता
ना हम बोलें, ना तुम बोलो ।

पल पल गिनती करते बीते
विरह पीड़ को और ना जोड़ो
नहीं कहेंगे जग की गाथा
मौन सखा, मेरे संग डोलो

थके ह्रदय लें फिरें अकेले
हाथ थाम लो, गुस्सा छोड़ो
मन, तुम सच्चे और हम झूठे
अब तो मान से मुँह ना मोड़ो

फिर खुद से एक वादा कर लें
तुम नज़रों के भेद ना खोलो
हम अपने शब्दों को सी लें
तुम अपने शब्दों के हो लो ।।