Monthly Archives: January 2020

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कितने बदले बदले से तुम

कितना ये दिन भी बदल चले

एक हठ से क्या खो चले हैं हम

हर दिन हर पल पछताते रहे

बेबाक़ बने, बिन शब्द तोल

हम शब्द माँगते तुमसे रहे

अनकही की तेरी दुनिया में

तुम और भी ज़्यादा चुप में रमे

अनगिन तोहफ़े कब से सम्भाल

हम नाम तुम्हारे रखते रहे

कल धीरे से एक दे पाए

एक साल से जो हम सींच रहे

कुछ कुछ निष्ठुर, कुछ नरम नरम

तुम दोनो रूप में दिखते रहे –

तुमने है लिया, या नाम किया

अब बैठ यही हम सोच रहे

चुप चुप के पर्दे के पीछे

बातों के शोर मचलते रहे

और आँखें बचा बचा के भी

आँखों के संदेशों चलते रहे

रूठे भी रहे , ऐंठे भी रहे

हम आँसू आँसू पीते रहे

और कहीं हार अपनी ही मान

तेरे सदके झुकते भी रहे

सब हठ छोड़ें जो मन में ठान

अरसे से झगड़ते तुमसे रहे

अब बात तुम्हारी सभी मान

हम रो कर भी बस हँसते रहे

कितनी क़समें हम हार गए

तुम माफ़ हमेशा करते रहे

एक क़सम उठायी फिर से अब

तुम बोलो तो, हम चुप ही रहें

एक तेरी चुप ने छीन लिया

मेरे मन के सब शब्दों को

विस्मित हूँ मैं इस होनी पे

सब शोर जगत के मूक लगे

और भीड़ लगे एकांकी सी

ना दोस्त कोई, ना साथ कोई

पल पल तुमको ढूँढा करते

जो राह मिली, बस चलते रहे

हँसना सीखो तुम फिर से ना

बस दूर दूर अब तुम ना रहो

चाहो जिससे तुम बात करो

हम चुप की दुनिया में हैं भले !!!!

तुम बोलो तो !

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एक उधमसिंघ नाम का station

थोड़ा सूना, बेहद सुंदर

भोर किरण मैं उसको देखूँ

भीड़ से हट कुछ यूँ भी सोचूँ :

कितनी इसपे आतीं जातीं

छुक-छुक की आवाज़ लगाती

कुली-कुली की कुछ गुहारें

चाय-चाय की भी थीं पुकारें

बस एक दो ही आतीं जातीं

देखीं मैंने वहाँ लकीरें

कुछ passenger क़ो ले चलतीं

माल भरीं कुछ रहीं खिसकतीं

क्या इनके ही जैसी होती ?

एक वो जिसमें मैं हुँ बैठी ??

छुक-छुक की आवाज़ सुनी ना

कौन रंग ये भी देखी ना

समय सारणी भी ना इसकी

ना तो driver ना ही guard;

जाने किस engine से बंधकर

पल पल पीछे चलते चलते

पलों को पीकर

धुआँ बनाती

किस पटरी से किस पटरी पे

किस station से पैदा होकर

किस station पे जा थमने को

किस किस राहगीर को चढ़ाने

किस को राह में साथ निभाने

किस को बीच राह उतारती

किस को याद डोर बांधकर

किसको भूल मिटाते जाती

याद नहीं ये कभी रुकी क्या

कभी ईंधन के लिए झुकी क्या

किसी मोह में कभी बंधी क्या

या निर्मोही मोक्ष लिपी क्या

किस signal की भाषा सुनती

कौन chain खिचने से रुकती

उसमें कौन है गाना गाता

कौन भिखारी वाद्य बजाता

दिन कब चढ़ता , कब ढल जाता

मौसम, साल बदलते जाता

यौवन बचपन लुकझिपी कर

कैसे वृध हुआ है जाता

मेरे प्रश्नों के बचपन पे

आसमान से कौन हरि सम

अपलक देख रहा मुस्कराता

अंतहीन प्रश्नों को छलता

कभी हँसाता कभी रुलाता

आँख खुली तब से पाया ये :

चले जा रही –

जीवन रेल !

जीवन रेल

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जीवन के आकाश में ऊँची

आशाओं की पतंग

समय धार से गिरती, उड़ती

कैसी बहे तरंग

ज़ोर से थामो, खींचो , छोड़ो

डोर रखो मलंग

सपनों के आकाश में समरस

मन पतंग उत्तंग

: उत्तरायण का सूर्य शुभ हो

संक्रांति की पतंग दबंग, उन्नत, मदमस्त हो !

उत्तरायण २०२०