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पहली दफ़ा

गज भर की साड़ी पहनी थी

स्कूल की फ़ेयरवल पार्टी में..

वो साड़ी थी ..

आज़ादी की उड़ान

ख़ुद की इच्छा से बाँधी साड़ी

पाँव फँसा तो सबने कहा,

“ज़रा सम्भलकर”…

फिर पहनी ..

गज भर की साड़ी शादी के बाद

इस दफ़ा साड़ी को मैंने नहीं

साड़ी ने मुझे बाँधा..

आज़ादी की उड़ान

ज़मीं पर रोक दी गई

पाँव फँसा तो सबने कहा,

“इतना भी नहीं सम्भाल सकती”..

फ़क़त एक कपड़ा ही तो था

बस मायने बदल गए

वक़्त के साथ…!!

मायने फिर बदलने की ठानी

एक बार फिर से बांधी

अपनी इच्छा से साड़ी

और रूख किया office का

पाँव फिर फँसा तो सबने देखा

किसी ने सम्भालने को कहा

किसी ने टोका

किसी ने शक से घूरा

और किसी ने तो हसरत से

लेकिन इस बार मन नहीं बँधा

ना सपनों में

ना रिश्तों में

ना हसरतों में

ना बेड़ियों में

यही उड़ान थी

आसमान में पंख पसारे

उड़ते हुए

दूर दिखते हैं सभी

किसने क्या कहा

क्या पता

पंख मेरे हैं

मेरी ही उड़ान

साँस मेरी

और मेरी ही जान

जब तक दम है

जोश है

उड़ते जाना है

मंज़िल सोची नहीं

सफ़र का लुत्फ़ उठाना है ।

बंधन मोह है

तोड़ना है

चलते जाना है ।

जब तक दम है

जोश है

उड़ते जाना है।