Monthly Archives: January 2016

सिसकियाँ

Standard

ग़म का क़तरा एक, हज़ारों आंसू;
उफ़्फ़ आँखों की ये फ़िजूलखर्चीयां !

एक एक क़तरे पे मिटी जातीं हैं
हाय हर जाम पे मेरी हिचकियाँ !!

जब सुनाई न दे रहा हो कुछ
गूंजती होंगी तब मेरी सिसकियाँ

बंद नज़रों से देखना उस दिन
कुछ ना पाओगे मुझमें तुम गलतियां

Standard

तुम शराब थे
या फिर फरेब-ए-नज़र ?
दिल पे क़दमों के निशाँ छोड़ गए
बस !

हम साहिल थे
या समुन्दर की लहर-
आते जाते रहे, या बस रुके
उधर !!

Tukadiyan:

एक टुकड़ा लम्हे का जाकर गिरा जाने कहाँ
हम बढे संग काफिले के, दिल रुका शायद वहाँ !

हुज्जत, वो भी तुम्हारी….
जायेगी जां हमारी !

जाने क्या भूल से कह गए तुम आज
तब से तुमसे खफा खफा हैं हम ।

रुके हुए हैं ख्यालों के काफिले कई दिन से
जमी हुई है काई की कई परतें यहां वहाँ
वही पुराने से कुछ लफ्ज़ कुलबुलातें हैं
नए गुल हैं कहाँ जो खुशबुएँ लूटा दें कभी
रोज़, हर दिन वही बस धुन सी गुनगुनाते हैं

मैं थामे कलम, लबों को कहूँ अब चुप भी रहो
बोलना तब, तराना एक नया जब भी कहो
वो मुस्कुराके मेरी खिल्ली सी उड़ाते हैं
रोज़, हर दिन वही बस धुन एक गुनगुनाते हैं !!

इश्क़ कहते है उसे
रूह को डूबा जाए
इस क़दर छाए नशा
खुद ख़ुदा इबादत को आये

इज़हार-ए-शिकायत
इसरार-ए-ज़ुस्तज़ु
किस काम के गोया

ना देखे, ना बोले तू !

उफ़्फ़ उफ़्फ़ में ही ये उम्र गुज़र जायेगी
शिकवे शिकायत की तो नौबत ही नहीं आएगी
ज़रा सा एक नज़र देख तो लो आप इधर
क़त्ल की ख़बर भी किसी को ना हो पाएगी !

बड़े लज़ीज़ हैं पकवान आज के
कि खुशबुओं में लज़्ज़त इश्क़ की है !

mushaayara-e-kitchen 🙂

महफ़िल

Standard

रुके रुके से कदम
जाने कहाँ जाते हैं
थमे, मगर ना ठहरे कहीं,
सुनें ना जग की कभी,
अपनी धुन सुनाते हैं।

जो मन से उठती हैं
लय ताल मिला
अनसुनी तरन्नुम से-
बाँध घुंघरू, ओढ़ चुनरी,
थिरकते जाते हैं।

साज़ ले बैठते फिर
साथ में मंज़र सारे
रूह के आहते
जुट जाते है मेले उस दिन
अश्क़ मुस्काते हैं।

लम्हे भी साँस रोक
उस घड़ी ठहरे रहते
चोरी से झाँक मन झरोखे से
अपनी झोली में
यादों को भरते जाते हैं।

नज़र ना लग जाए
खौफ ज़दा दिल की सुन,
लबों पे डाल के ताले
नज़र झुका बेशक,
दौलतें  अपनी ज़माने से हम छुपातें हैं।

रिश्ते

Standard

रूह के रिश्ते
ना क़ुरबत
ना ज़िन्दगी
के मोहताज होते हैं !

आपका ज़िक्र कभी लोग जो उठाते हैं
कहीं गुरूर से हम छिप के मुस्कुराते हैं
कोई हसरत नहीं, फितरत की गुनेहगारी है,
खामखा हक़ आपके नाम पे जमाते हैं!

मौसम

Standard

रख चलें हैं ताक़ पे
अलफ़ाज़ सब इस कलम के
ये कभी लिख ना सकी
जो भी मेरे दिल ने कहा

कोरे पन्नें छोड़े थे कुछ,
कुछ अधूरे भी कहीं पर,
ये ना पायी बाँध मेरे
ख्वाब-ओ-अरमां का जहां

“अनकहे भी, अनलिखे भी”
जो दिखे, और ना दिखे भी,
नज़रों ने लेकिन कही
उन लम्हों की हर दास्तां

किस कहानी में सुनाऊँ
किस किताब में छपाऊँ
किसको फुरसत जो पढ़े
तेरे मेरे दिल की जुबां

अक्स भी कुछ बदला सा अब
कहने सुनने को बचा कब,
और क्या, ये भी पता ना,
बढ़ चला है कारवां !

2016

Standard

झुकती हुई नज़रों ने सिमटीं बीते दिन की बस्ती
उठती हुई पलकों ने बिखरीं आशाओं की मस्ती
एक साल ने बूढी अपनी गठरी आज उठाई
एक साल ने उसपे अपनी युगल बिसात बिछाई…..