Monthly Archives: November 2018

Quote

“फिर कभी की राह में

कभी “कभी” ना होए”

क्यू कर आस करे रे मन

किस बैरन को रोए

प्रेम डोर चिटकी जब से

लाश आस क्यू ढोए

रहिमन कहे ना जुड़े कभी

गाँठ पे गाँठ सँजोए

जो औरन के संग में

बीज मधुर फिर बोए

फिर ना फिर पे लौटेंगे

जतन लाख कर कोए

Quote

उधर अकेला चाँद चल रहा

इधर जमीं पर हम

वक़्त के जैसे खोए से और

चाल भी है मध्यम

.

देख बस्तियाँ जगमग जगमग

यादों में रम जाते

जुगनू जुगनू सौंधा सौंधा

हम आशीष लुटाते

.

पल दो पल रुक जाते जब जब

कभी कहीं थक जाते

जैसे अमावसी चाँद बन

दम भर को सुस्ताते

.

कौन चकोर ताकता चन्दा

किसको चंदा ताके

मोह की पूरनमासी में हम

कभी कभी फँस जाते

.

मोह स्वपन से जागे फिर फिर

चलते अपनी चाल

कभी बुढ़ापे जैसे बेदम

कभी जवाँ, ख़ुशहाल

.

आते जाते कितने बदरा,

और चाँदनी रातें

लुका-छिपी नयति का खेला

वक़्त वक़्त की बातें

.

ऊपर कभी हमारे बादल

बादल पे कभी हम

चाँद छुपा ले चेहरा कभी

कभी तो जाए तन

.

झरने देना बूँदें रिमझिम

धो लेना ये मन

कभी ओढ़ चादर बादल की

रहना थोड़ा नम

.

घटता बढ़ता मन साम्राज्य

आती जाती बातें

व्यथित तो कभी विस्तृत सी

ये चाँद नगर की रातें

.

सुंदर और असुँदर लगते

मन गायन के राग

मन भाए तो सुंदरतम

मन उखड़े लगे विराग

.

उपमा हो सुंदरता की कभी

चौदहवीं का चाँद

कभी अधूरे के तमग़ा दे

पूनम रहे मधमास

.

क्या सखी आधा, क्या सखे पूरा

मन या हम या चाँद

मन आँखों से मोह,दोस्ती

यहाँ हम, वहाँ वो चाँद !

चाँद से हम

Quote

“पीले दुपट्टे के छोर सी छूती

सर्दी की हल्की हल्की सी दोपहरी

झूले के छाओं में, आँगन में तेरे

बगिया में तेरी, वो ठहरी सी दूरी”

बैठे अकेले वहीं थी मैं आज

और साथ थीं बीतीं गुनगुनी से बातें

जाने की जल्दी भी, रुकने का मन भी

वो छोटी-छोटी मुस्कराती मुलाक़ातें

“कल आ जाओ” आज बोले तो तुम लेकिन

ना थी कशिश,ना ही चाहत,ना उल्फ़त

कहती रही लाख बुद्धि रहो चुप

ये दिल पर ना माना कर बैठा बग़ावत

तुम जो बुलाओ तो मन से बुलाओ

और मैं जब भी आऊँ,तुम्हारे लिए ही

दुनिया की रस्में निभाने को आना

तो बेहतर है फिर झगड़ा करके रुक जाना

इतनी बुरी हूँ मैं, इतनी ही ज़िद्दी

इतनी है चाहत और इतनी ही नफ़रत

इतने सही हो तुम, इतने भी ज़िद्दी

थोड़े ग़लत भी, मानो ना ये फ़ितरत!

हैं मुझको ग़म येही कह दो कभी तुम

सही या ग़लत, फिर भी मैं तुमको प्यारी

रस्में निभाने को हुँ साथ हरदम मैं

गर हाथ में रख दो क़िस्मत “हमारी”

तुम जितना बोलोगे उतनी मैं वहशी

तुम जितना तोड़ोगे उतनी ही टूटी

जितना रुलाओगे उतनी दुखी भी

और जितना समेटोगे उतनी खरी सी

दुनिया में तेरी मुझको तुम बनाते

दुनिया में मेरी मैं हूँ पहले ही सी

बस एक दुशवारी, और एक नागवारी;

बस एक जुनून है मेरा और तुम्हारा

तुम जो जीतोगे तो तुम ही तुम होगे

हारोगे तुम तो भी तुम ही रहोगे

जीतूँगी मैं तब भी जाऊँगी दूर

तुमसे, तुम्हारे रूठे से जहाँ से

बस तब ले जाऊँगी मीठी सी यादें

और मिट जाएँगी झगड़े की दीवारें

वरना जब जाऊँगी टूटेंगी संग तेरे

जाने कितने ही रिश्तों की मीनारें !

अश्क़ों के दरिया में फिर भी उम्मीदें ये

एक दिन तो फैलीं सी हो तेरी बाहें

आँखों में ग़ुस्सा, ना नफ़रत के क़तरे हों

मन में पुरानी थोड़ी तो हो चाहें

जिस दिन दिख जाएँ मैं सब भूल जाऊँ

बस दौड़ के, थाम के तुम को, रो लूँ

सर्दी की दोपहरी सी गुनगुनी सी

उस धूप में सारे शिकवे मैं जला दूँ

माँ ने सुनायी थी मुझको कहानी

बचपन की मेरे, जब ज़िद मैंने ठानी

उमर बरस दो और माँ से हुआ हठ

रही दूर बैठी, तनिक भी ना मानी

तब आगे बढ़के गले से लगाया

माँ ने पुचकारा, था मुझको मनाया

मन फिर से ढूँढ़े वही ढ़ीढ़ ड्योढ़ी

हो ना शर्त और कोई ना दूरी

बचपन से बिगड़ा रहा है ये माज़ी

तुमने भी इसको इतना बिगाड़ा

बच्चा बनाके मुझे, एक पल में

अब बोलते हो, ना बचपन गंवरा

जाओ हटो मुझको ये वाले नहीं

वही पहले वाला “तुम” कोई दिला दे

हँसना सिखा दे जो फिर से मुझे

मैं हूँ ख़ास फिर से यक़ीं ये दिला दे

रूठा हुआ है नहीं मानता मन

टूटा हुआ सबसे प्यारा खिलौना

और जिसने छीना, झपटी में तोड़ा

“कट्टी” रहूँगी उससे अब मैं क्यू ना?

इतने बड़े जो बने हो अभी तुम

बस डाँटते हो, ग़ुस्सा दिखाते

तो एक बड़े के जैसे ही रहके

हँस के कभी तो गले भी लगाते

तब मान जाऊँ बातें तुम्हारी

तब हार जाऊँ सब “ज़िद हमारी”

झूले में झूला करूँ तब अकेले भी

उफ़्फ़ ना करूँगी क़सम है तुम्हारी !

बग़ावत

Quote

समय ना रुक सके ना चल पाए

इस क़दर याद भी ना आया करें

चाँद भी अब्र के परदे में छुपा

नाम ना चाँद का लगाया करें

आज फिर आरज़ू ये कहती है

कभी तो मिलने भी आ जाया करें

नज़ारों झुकतीं हैं तो झुकने दीजे

उनपे इल्ज़ाम ना लगाया करें

सिमटे तो रहते हैं ख़यालों में

नींद से हमको ना जगाया करें

फिर मचलती है तूलिका मेरी

आप यूँ नाज़ ना उठाया करें

रोज़ नाराज़गी जताते हैं

प्यार कभी तो बरसाया करें

चार लमहात ख़ुद से इश्क़ करें

रोज़ ना ख़ुद पे सितम ढाया करें

अपनी ख़ातिर ना सही, मेरे लिए

अपने नख़रों को भी सजाया करें

हम उसी मोड़ पे हैं ठहरे हुए

मुड़ के हमको भी देख जाया करें

क्या करें बेबसी का आलम है

माफ़ करिए, औ मुस्कुराया करें !!!!

19/01/2017

ठहराव 

Quote

बड़े नाज़ुक से हैं जज़्बात

दिल पर राज़ करते जो

सभी तर्कों को दे कर मात

नख़रे लाख करते वो

ख़ामोशी है ज़ुबान पर और

नज़रें बात करतीं हैं

होश बन बैठा है मदहोश

दुनिया ख़्वाब सी ही हैं

नज़ारे ख़ूबसूरत हैं

हवाएँ गीत गातीं हैं ….

बड़ी नादान हो तुम यार

बात ये जो उठाती हो !!!!!

From Archives.

कभी नादान थे दिन …..

Quote

कहाँ कहाँ से भटक भटक कर

उसी मुँडेर पे के बैठता

मन का पंछी बड़ा हठी है

कब ये किसी की भी है सुनता

रोज़ ताकता आते जाते

तुम ना रुकते , तुम ना पलटते

कितनी भी आवाज़ लगा लो

सुन कर भी तुम कब हो सुनते

मैं समझाती, रोज़ मनाती

जग समझाता , डाँट भी खाता

देख तुझे और सोच तुझे पर,

एक बात पे बिफ़रा जाता

जैसे माँ का आँचल खींचे

नन्हा बालक ज़िद से अटका

ना समझे है, नहीं मानता,

बार बार एक रट है कहता

कब तक तुम रूठे बैठोगे?

कभी भी अब क्या ना बोलोगे??

क्यूँ मैं झूठ कहूँ कुछ तुमसे?

कब तक मुझसे दूर रहोगे?”

मन विद्रोही आँखों में भर

प्रश्नों की अनंत कड़ियों को

चुप चुप रहता सबकी सुनता

अपनी ही पर धुन में चलता

ग़ुस्सा तुमसे, मोह तुम्हीं से

वैरागी जग की रस्मों से

घर के नित्य नियम को निभा कर

रहता उसी मुँडेर पे आकर

आदत शायद टूट भी जाए

यादें भी धूमिल हो जायें

शब्द भूल जाएँ कहना जब

आँखों में रह जाएँगे तब

भूले से गर देखोगे तुम

कभी झाँक के दो नैनों में

मन तब भी आँचल को पकड़े

तुमसे ये ही पूछेगा तब

कब तक तुम रूठे बैठोगे?

कभी भी अब क्या ना बोलोगे??

क्यूँ मैं झूठ कहूँ कुछ तुमसे?

कब तक मुझसे दूर रहोगे?”

और भी कहने को बैठा मन

क्यू तुम भाग रहे हो ऐसे?

किस से बाँध रहे मन अपना?

किस से तोड़ रहे हो रिश्ते ?

पूछे तुमसे हर पल ये मन

किसको अब तुम भेद बताते?

कौन बैठता एकांकी में,

तुम संग बाँटे मन की बातें?

तुम शब्दों से भाग रहे हो

जब सीखेगा चुप रहना मन

क्या तब तुम सह सकोगे बोलो,

मेरे मन के चुप का कृंदन?

क्या तब तुम सह सकोगे बोलो,

मेरे मन के चुप का कृंदन?

मन का पंछी

Quote
दो नैनो के अपने सपने
जग की रीत से अजब अनोखे
पलकों में चुप कर जीते हैं
डरते कोई इन्हें ना देखे
दो नैनो ने पर कब तोडा
पलकों के बंधन का घेरा
दो नैनो ने दो नैनो से
सपनो का ले लिया बसेरा
दो नैना अब खुश रहते हैं
साम्राज्य अपना बिखरा के
संग मेरे हँसते रोते हैं
कोई दो नैना सांझे हैं
बैन ना बोले फिर भी देखो
कितना कुछ कहते दो नैना …
.
.
.
कितना कुछ कहने को आतुर
दो नैना उन दो नैनों से
रुक जाओ, सुन लो, देखो तो
मूक पुकारें हैं दो नैना
दो नैना जब ना सुन पाते
दो नैनों की अनगिन बातियाँ
दो नैनों का ढाढ़स बाँधे
प्रखर मचल जाते दो बैना
.
बैना ये कितने रीते हैं
शब्द मगर कितने फीके हैं
बिन बोले कह लेते नैना
बोल के भी बेबस हैं बैना !
फिर दो नैना हाथ थाम ले
बैनों को वापस खींचें हैं
शब्दों को काजल में भर भर
उठते , झुकते आतुर नैना
.
नैनो ने नैनो से कह लीं
सदियों सदियों सभी कहानी
नैनो ने नैनो की सुन लीं
और सभी अनकही भी जानी
कजरारे नैनो की भाषा
अश्रु घुले काजल की आशा
प्रणय गुहारें , और तकरारें,
अनुनाय, विनय, और मनुहारें,
हर्षित, मुदित, कभी प्रेरित सी
विस्मय भी और भयमिश्रित भी
आस ज्योत से आनंदित सी
जिस संग जुड़ जाते दो नैना
कह सुन पाते , और मुसकाते
मन कस्तूरी के गीतों को
गाते, रास रचाते नैना
.
कितना कुछ कहते दो नैना !

कितना कुछ कहते दो नैना

Quote

Late again

For the class

I rushed and gushed

I ran and panted

Only to halt

With jerk at the Gate

For it was all new

Bright and glistening

To my delight

To sheer surprise

The sector bathed

In strings of lights

Tiny bulbs

Courful, some white

The rows of trees

Skirted with twirls

Of lit up spirals

The hedges stroked

With splashes of sparks :

I felt I have stepped

Into a fairy world

That’s painted fresh today

To welcome with grandeur

The king of all festivals

I forgot I was late

And slowed down

Confused where

to freeze the gaze

To the left or to the right?

And walked yet slowly

Head turning

Like a ping pong ball

In split seconds

To the left, to the right,

Or straight or still more

Into the depths of the streets

Of beautiful rows of houses

Twinkling novel and bright

And I reached at the doorstep

Unwilling to step into the class

Yet forcing myself in

But staying virtually out there

And meditating all through the class

Of the festive spread outdoors

I knew not how long was the class

For I wasn’t actually there

And as if uncaged and freed

When I stepped out of the class

It was yet another walk

Through the “Alice in Wonderland” patch

Just that there weren’t any rabbits

Or caterpillar or cat or cards

But were glows in varied hues

And the season’s sheer romance

Spirited to vodka highs

I thus walked and drove through

And my once mundane heart

Had the tears turn to dew

That’s the sheer magnificence

Of the spirits all around

And new clothes, and lights and smiles

Marks Diwali every mile !

B-10

Quote

कभी कभी लगता है यूँ भी

राह खड़ी मै निपट अकेली
जग है मेरी हसी उड़ाता
वो भी हाथ न थामे मेरा
देख के मेरा कलुषित चेहरा
तुम भी दूर दूर हो मुझसे
कि मै तेरा नहीं बसेरा
निपट अकेली…राह खड़ी मै…
और जग मेरी हसी उड़ाता…
शीश झुकाए बढ़ते जाती
जाने किस अनजान डगर पे
कोई साथी हाथ बढ़ाए
बन्धु जो पर साथ को आये
अब कोई ना मन को भाता
उन संग मै ना आँख मिलाती
तेरे नैनो से ना नाता
जो था अपना वो कब छूटा
ना जाने क्यों, जो ना अपना
उस सपने से भी मन टूटा
आज खड़ी मै
हाथ मेरे हैं दोनो रीते
किसको दूँ आवाज़
मेरे तो शब्द भी फीके
हँसती हूँ तो भी
नैना ये भर आते है
रोती हूँ तो थक कर के
फिर मुझसे पूछे
येही चाहा था क्या तुमने,
मन रे पागल??
और मन मेरा बौराया सा
कहता मुझसे-
चाहा क्या
ये तो तुम कभी जान ना पाए
बस ना छूटे डोर
तो जो भी बोला माना
अब भी क्या दू  नाम तुझे
मन ये ना जाने
बस इतना कि स्पंदन है तू ,
जगत रीत में !

#me too# की गुहारों से परे