Monthly Archives: December 2016

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तलब-ए-चाय पे फिर फिर 

पुकारें हैं तेरी यादें

झिझकते राज़ कुछ ढाँपे,

बताए कुछ, तेरे आगे 


ख़यालों में तेरे निश्चिन्त

हो जाना ख़ुशी ग़म से

बुरी आदत है, ये आदत 

मेरी आँखों में ही जागे 


कभी प्याला थमा दो तुम

कभी प्याला मना कर दो

फ़रक इससे फ़क़त इतना

ख़्वाब के टूटे कुछ धागे


कभी हंस के उड़ा देते

रूठ के कुछ रुला देते

कभी ग़ुस्से में मुँह मोड़ें

तूझही से दूर मन भागे


दूर कितना?

 दूर किस ओर?

देखो शाम आती है

पेड़ की छांव के नीचे

आँच की ऊष्म को पीते

एक कुल्हड़ में गिरती चाय

फिर मुझको बुलाती है …

थके से पाँव रुक जाते हैं

कितना दूर अब भागें?

तलब-ए-चाय पे फिर फिर

पुकारे हैं तेरी यादें !!!!!!


07/11/2016

इश्क़-ए-चाय 

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सिमट गए हैं दिन-ओ-रात के ये सिलसिले कुछ यूँ

गुज़र जाते हैं भागते वक़्त ही के पीछे अब तो

जो घंटों में गुज़ारा करते थे इधर उधर कभी

देखते बादलों को लेट के दरख़्तों के तले

गुफ़्तगू दोस्तों से बिन किसी मुद्दे, किसी ग़म के

चाँद तारों के साये में शायरी का दम भरते

दिन चढ़े ढाँप के चादर से चेहरा देर तक सोते

कोरे पन्नों को बेवजह सियाही से रंगा करते 

जाने अनजाने हर चेहरे को मुसकाने अदा करते

ना जाने खो गए कहाँ ? उम्र के साथ तो पकते !!

घंटों में ना सही, लमहों में मिला करते;

दफ़्तरों की फ़ाईलों से कभी तो झाँकते दिखते;

रोज़मर्रा की उलझन को कभी तो छेड़ के हँसते;

वक़्त से होड़ करते क़दमों से कुछ नोक झोंक कर

चार पल फुरसतों के हाथ में देकर गले लगते!
और ज़िद्दी दिल-ए-नादान उनको यूँ मनाता है-

वक़्त से रूठ कर, मुँह फेर कर, बस बैठ जाता है;

भागते रहते हैं दिन रात, आगे वक़्त बढ़ जाता;

एक पागल सा लम्हा वक़्त का, बस साथ रुक जाता-

थाम के हाथ मेरा, मूँद आँखें बस ख़ामोशी से

फुरसतों की बादशाही याद ही में जिया करते !!

फुरसतों की बादशाही 

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शब्द कब बाधा बने

तेरे मेरे संवाद में 

शब्द पे ही क्यों रुके

अनुभूति के उसाँस रे 
हार जायें जिस क्षितिज

अक्षरों के साम्राज्य सब

उस नगर विस्तृत जिए

अनुपम मृदुल मधमास ये
कब हुई और किस दिशा 

ना जाने कैसी भोर है

चंद्रमा सी शीत, 

रक्तिम रूप के अरुणाभ में
तुम धरा पे चाँद तारे तो 

बिछाओगे नहीं 

ना सजाओगे मुझे 

रत्नों जड़ित एक हार से
पर दिए हैं जो आभूषण 

नयन कोरों से सभी

मोल में अतुल्य हैं

संवेदना बाज़ार में
जो रुकें अधरों के छोर

बस फिसलते रह गए

गूँजते हैं गीत वो

मेरी हृदय झंकार में
रीत कब मानी नहीं

कब युद्ध दुनिया से किया

चंद्र अधरों, स्वपन नयनों

से नियम स्वीकारते
मूक अधरों, बंद नयनों

ने कभी एक युग जिया

कर आलिंगन पल प्रति

जिसको नियम धिक्करते
तुम धरा भी, तुम ही अंबर

तुम ही दिन भी, रात भी

तुम वियोग, तुम प्रतीक्षा 

तुम अतुल अनुराग भी
एक युग भी, एक पल भी

एक जीवन भी तुम्हीं

साथ मेरे तुम नहीं

और तुम ही मेरे साथ भी
कह रहे हैं गीत मेरे-

सुन, तेरे अगान से

शब्द पर ही फिर रुकें

अनुभूति के निशवास ये !!!!!!
१७/१२/२०१६

अनकही

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उम्र की पगडंडियों के

हर अधूरे मोड़ पर बस

आस केवल एक थी

मुट्ठी भरे आकाश सी
साथ मेरे कोई चल दे

चार ही चाहे क़दम पर

चार पल को कोई बैठे

आ हमारे पास भी
बिन पते के लौट आता

नित्य आशा का निमंत्रण

और सूखे ओंठ पर

अठखेलियों की प्यास थी
भोर गठरी बाँध अपनी

ताका करती पथ वो निर्जन

किंतु ना देखी निशा ने

किरण कोई आस की
नैन में ही रह गयी सब

कल्पनाएँ छटपटा कर

एक प्रतीक्षा थी प्रतिक्षित

द्वार पर परिहास सी
टूट बिखरी पायलें सब

सावनी पनिहारियों की

आयी ना लेकिन कहीं

बदली कोई मधुमास की
धुँध कुहसाती रही बस

बढ़ रही दुशवारियाँ कस

पालकी पुरवायी की

लेकिन क्षितिज के पास थी …..

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