Category Archives: Relations

गोटी

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धूल, मिट्टी,धूप,बारिश
कुछ भी कभी रोक ना पायी
उसने जो आवाज़ लगाई
इसने हर जेहमत उठाई
माँ को मनाया, पैर दबाये
पिता जी की डाँट भी खाई
चोरी से सबकी नज़रें बचा के
अपनी तिज़ोरी की ताली उठाई
चिकने चिकने,गोरे गोरे
देख उन्हें नज़रें ललचाई
एक इशारा सीटी का पा
दिल की उमंगें लें अंगड़ाई
भर हथेली में, छिपा जेब में
चले खेलने गोटी भाई !

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वो राह तो चलते जाना है।

हम एक चले अनजान डगर
तुम एक मिले ना हमसफर
और एक जुड़े, और एक जुड़े
बस राह पे चलते जाना है।

चले इधर उधर हमडगर कभी
कभी प्रीत से बंधते रहे सभी
कभी तकरारें, कभी तलवारें
कैसे भी राह निभाना है।

पाना है क्या- कुछ भी तो नहीं
खोना है क्या-कुछ भी तो नहीं
“कुछ भी तो नहीं” के ऊपर पर
सब कुछ का दाँव लगाना है।

जब आँख खुले, नापे तौले;
जब बैन हिलें, तीखा बोलें
“तुम” को भांपते रहने में
बस ध्येय “स्वयं” को जिताना है।

और राह बढे, और समय चले
और राही पाये स्वप्न नए
और एक जुड़े, और एक जुड़े
उस राह का नहीं ठिकाना है।

बस साँस थकी, अब और नहीं
अब प्राण शेष थोड़े ही सही
ना चाह शेष, फिर भी है कमी
किस राह से मुक्ति पाना है?

ढूंढें हैं सभी के थके नयन
एक तृप्त हँसी, एक गहन शयन
फिर जोड़ रहे मुड़ प्रीत डोर
अब सही डगर को जाना है।

ना रुके कभी, ना झुके कभी
जो सीने चौड़े तने कभी
कुछ देर ठहर, थोडा झुककर
नतमस्तक हो पहचाना है

वो राह तो चलते जाना है ।
वो राह तो चलते जाना है ।

Dedicated to the Landmark forum.
With regards to Ramesh Sir!

राह

ताज मेरा तेरा सा…..

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इस किनारे मैं खड़ी;
और तुम रुके थे उस किनारे-
रात आधी, चाँद आधा,
और यमुना की लहर पे
ताज की परछाई छनती;
कह रहीं,
ये ताज मेरा-तेरा सा।
एक कंकड़ ने उछल कर सब मिटाई-
बात भी सब,
और सारी परछाई।
कुछ भी मेरा तेरा क्या?
पर ना जाने क्यों ना माने,
आज भी मन भाग जाता;
चांदनी में भीगते से
ताज को फिर से मनाने,
रूठे लम्हों को बुलाने,
और तुमको भी है पाता:
उस किनारे खोये से कुछ,
ढूंढते कुछ,
कहते कहते;चुप से कुछ कुछ।
बात आधी ही उठी थी,
आँख आधी ही खुली थी,
देखने को था बचा
और कहने को था कितना सब कुछ;
वो अधूरी बातें ही तो खींचतीं हैं,
बाँध के रेशम की डोरी में हमे फिर
और फिर मैं चाँद से ही पूछती हूँ-
कब मिलेगा?
पल वो पूरा-ना रुकेंगे शब्द जब फिर,
चाँदनी में जब दिखेंगीं तेरी नज़रें,
और ना रह जायेगा कुछ अनकहा;
कुछ भी अधूरा…..
आएगा कब पल वो पूरा???

तुम सुधर गए मैं बिगड़ गयी….

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एक झंझावात आया था
मेरा जग कुछ थर्राया था
अपने अपने खोह में दुबके
सबको उसने आजमाया था
तुम संवर गए, मैं बिफर गयी।

तुमने तो पूजा सर को झुका
जो सही, अमल उसपे ही किया
क्यों हार ना मान सकी पर मैं
ढूंढूं अपनी ही कहानी सी-
तुम सुलझ गए, मैं उलझ गयी।

कब वक़्त पे किसका ज़ोर चला
किसने देखा पलड़ा उसका
जग ने जानी राधा, मीरा,
रुक्मणी नाम की रानी थी;
तुम समझ गए, मैं मुकर गयी।

राहें हैं बनी अनजानी सी
तकदीर करे मनमानी सी
तुम यत्न मनाने का करते
मैंने तलवारे तानी सी-
तुम सिमट गए, मैं बिखर गयी।

थामे ही रहे तुम अपनी धुरी
और मैं विस्मय में डगमग थी
तुम जोड़ रहे तिनका तिनका
मैं खोज रही मनका मनका
तुम सुधर गए, मैं बिगड़ गयी।

परछाई

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बहुत सी बात कहनी है
बहुत सी बात सुननी है
वो एक अधूरी दास्तां
अपने दामन से चुननी है

कभी हम कह नही पाते
कभी तुम रोक लेते हो
कुछ तो खुद ही से हम हारे
और कुछ ऐंठ के मारे

अब तो डर सा सताता है
तार ये जो जुड़े दिल के
कहीं कल चरमरा जाएँ
ये भी जंग के मारे

ना कोई मोम ही पिघले
ना कोई तेल की परतें
रोज़ ही धुप में पकते
कभी बारिश इनपे बरसे

चाँद भी आये जब जब लेके
मलहम सर्द रातों का
तेज़ कर जाए चढ़ना
तार पे जंग यादों का

रोज़ देखे मुझे छुप छुप
और नज़रें चुराए भी
मन में ही रहती है हरदम
और मन से ही भागे भी

बहुत ज़िद्दी है तेरी याद
बिलकुल तेरे जैसी है
बस इसी बात से ये साथ
परछाई सी रहती है ।

फ़िदा

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साहिल से समुन्दर पूछ रहा-
वो कौन सी खूबी है तुझमे?
जिस शख़्स का हाल कभी पुछा;
तुझपे ही फ़िदा वो रहता है!

दूर-औ-दराज़ से आतीं सब
नदियां मेरे आगोश में हैं;
फिर भी तेरा ही नाम लिए
उम्मीद का दरिया बहता है ।

साहिल ने कहा मुस्का के ज़रा,
“चख लेना अपना स्वाद कभी।
तुम बाँध रखो आगोश में जग;
पंछी उड़ने को कहता है।”

नज़राने हीरे मोती के
कब काम किसी के आते हैं?
बस चंद साँस आज़ादी की
पाये वो दीवाना रहता है !

Quote

फिर मिटा दूँ
फिर से खेंचू रेखाएं
कुछ भी लिख कर
कुछ भी बनाते हुए
निहार लूँ,संवार लूँ,
बिगाड़ लूँ,उजाड़ लूँ
कुछ भी बदले नहीं लेकिन

कितनी ही चाक चलें सीने पे
रंग हो या सफ़ेद फीकी सी
मेरे श्यामल की खूबसूरती को
छू के खिलातीं , जग को दिखतीं
और एक हाथ भर फेरने से
मेरे आसमान से हटतीं….

काश मैं एक सलेट सी होती

सलेट

वो लम्हा…

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दिन उग जाता मगर चढ़ता नहीं है
बस उसी एक लम्हे में रुका सा
मैंने जब खोल के पलकें तुम्हे देखा किया
और हौले से हाथ फेर सर पे,
‘उठो’ कहा
वो ही लम्हा ठहर सा जाता है;
रोज़ ही-
सुबह से जाने कब तब…..
यूँ ही बालों में तेरे फेरते उँगलियों को,
तेरी एक आवाज़ के टुकड़े को देखा करूँ,
कब मुझसे मिलेगा –
और वो भी मुस्का के कहे,’सोना’!

दिन उग जाता है और फिर अकस्मात् ही
चढ़ जाता है सीधा दोपहर में
रोज़ अलसायी सुबह जागती है
तेरे दो पल के पीछे भागती है
और अक्सर ही वो पल दूर जा रुकते हैं
क्षितिज के सहराओं पे कहीं
दिन तो उग जाता है हर रोज़ ही
दिन मगर सदियों से उग कर रुका है ।

Quote

Tonite
I want to get drunk
The intoxication
To last for life
The spirits
To float free
With endless smiles
The courage to speak
My soul out
The freedom to let go
The tears I hold
Yearning not
For the friends
Hinding no more
From the foes
Dancing again
The steps of gold……
Tonite
I yearn to live
Wear again the bliss
This strong Tonite…
I want my drink !

Free me