Category Archives: Love

झूला

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झूले पे अधलेटे
चँदा को हम देखें
धीमे धीमे हिंडोले पे थे डोलते
कभी नज़र में आता
कभी छिपा कहीं जाता चाँद!

मोगरे की खुशबू
मदमाती, बहकाती सी
और गोदी सर तेरा-
ग़ज़लों के शेरों की
चाशनी में डूबा सा चाँद !

रुक जाता वक़्त वहीं
हम तुम के लम्हों में
कितनी ही बातों के
कितनी ही चुप के भी
भेद को बटोर चला चाँद!

दिन भर के शिकवे शिकायत,
किस्से कहानी,
नगमों की रूह,नज़्मों की जुबानी,
मेरी हाथों की किताबों के साथी पल
नज़रों में झाँक मेरी, देख रहा चाँद !


May’2015
Lovliest Gift !

May

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May

He may
He may not
I wondered
And i fought
My own mind-
The spolit lot!

Yes May it was
I dared to go
The house was warm
His face did glow

I trembled but
I fumbled yet
His calm sustained
What I long lost

The hands of clock
But never stopped
His eyes drugging
And I stayed back

A little longer
With him, yet loner
Stay more, insisted
The voice so soft

I would have gone
I wouldn’t have come
“What if..” that day
I miss the “last May” !

तुम

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तुम दूर मेरे या पास मेरे
मन में हर पल हो बसे रहे
जग से थक कर भी तुम्ही शरण
तुम से लड़ कर भी चाहूँ तुम

मधुरिम सबसे जो जगह लगी
वो अंक तुम्हारे समा मिली
तेरे नेह बसी एक मेरी छवि
और मेरे रोम रोम में तुम

नन्हे एक फूल के आने से
जीवन में स्वर गुंजन करते
सृजन के इस अक्षुण पल से
कुछ और बंध गए मैं और तुम

हर दुःख का तोड़ तुम्हारा स्पर्श
और सुख का चरमोत्कर्ष भी स्पर्श
माया की आपाधापी में
अलौकिकता का स्पर्श हो तुम ।

– 14/02/03
From Archives.

सुरूर

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बहुत पीने लगी हूँ।

सोचती हूँ –
हर एक प्याले की मय मदहोश
तुमको करती होगी।
कहीं फिर बेखयाली में
बहक कर ;
मेरा तुम नाम लोगे!

और भूले से जो
गर मिल गए मुझको
मदहोशी में बहके;
तो कुछ पल फिर चलेंगे
गुफ्तगू के सिलसिले-
मुझे मदहोश करते।

इसी एहसास में भीगी
ना जाने कब से हूँ डूबी
तेरे मय के पियाले में
मैं पीते जा रही हूँ।

मगर कमबख्त चढ़ता ही नहीं!
नहीं इसमें नशा कुछ!!

नशा तो बात में तेरी,
जो मुझको हैं डुबातीं।
नशे में बेहेकतीं नज़रें,
जो तुझसे टकरा जातीं।
वो मखमल सी तेरी आवाज़ में
सुरूर सा है;
वो किस मय में भला है?

कहते है लोग सब मुझसे,
‘बड़ा तुमने सधाया।
हम तो दो में बेहक जाते
तुमने क्या हुनर पाया!’
कोई ये कैसे समझाये
ये कोरा पानी सा है-
जो इस मन पे चढ़ा;
उससे बहुत फीका नशा है।

पल

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“सुनो”
उनींदा सी आवाज़ में उसने कहा,
“कभी ऐसा भी होता है क्या-
कि दिन गुज़रते रहें, मगर पल ये थम जाएँ?”
एक हँसी ही मिली जवाब में,
एक उपाधि के साथ,
“बेवक़ूफ़”!!
वो तो कह के चला गया
ना जाने कहाँ;
कितने दिन बीतते गए
पल मगर थम गया-
उसी लम्हे में।

Quote

“तुम चुप क्यों हो?”
चाँद ने अम्बर से पूछा।
“कल अमावस्या है,
तुम नहीँ मिलोगे।”
मासूमियत से अम्बर बोला।
खेल ही खेल में
धरती ने घूमना रोक दिया;
और एक रात की अमावस
एक उम्र सी लंबी हो गयी-
कभी सोचा ना था
लुका छिपी ये रूप दिखाएगी।
आज चाँद चुप है…… !

अमावस

Quote

एक काग़ज़ पे कल बेखबर से
खेचते यूँ ही लकीरें कोई
उठ के कुर्सी से जब लगे जाने
यूँही कागज़ पे और नज़र डाली
नाम तेरा मुझे देख के मुस्काता था…

रेस्तरा में…..