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याद है ?

वो पेड़ पे नाम उकेरते लोगों की

कितना आलोचना करते थे ।

और शाम की लम्बी-लम्बी सैर में

दुनिया को बदलने के हौसले भरते थे ।

वो गीत और ग़ज़ल गाते गुनगुनाते

कितनी कविताएँ रचते थे ।

और पत्थर पे रंग बिरंगे

अनेकों सपने रंगते थे ।

*

बचपना ही तो था

ख़ुद को मगर कम ना समझते थे ।

और हाँ , हा-हा-हा-हा…

कितना खुल के हंसते थे ।

साल बारहवें में जब मिले थे

क्या पता था यूँ घुल जाएँगे ।

और रास्ते जो बँटे तो ना सोचा

क्या फिर एक दिन मिल पाएँगे ।

*

बचपना ही तो था

बिना मोहब्बत के तकिया भिगोते थे ।

लम्बे-लम्बे पत्रों में

नित नए ख़्वाब संजोते थे ।

वो किताबों की आदर्शवादिता

कैसे लहु में बसते चली गयी –

और छोटी सी वो लड़कियाँ

पता ना चला कब प्रौढ़ा बन गयीं ।

*

कुछ वर्षों पहले कई साल बाद मिले

बड़ी भागी- भागी सी मुलाक़ात थी।

शादी, बच्चे, पुरानी यादों के बीच,

ताले से झांकती सपनों की तादाद थी ।

कहाँ बातें पूरी हो पायीं थी-

कितने सिरे छूटे रह गए थे ।

तब और अब में फ़र्क़ कैसा?

सिलसिले अब भी अधूरे से ही थे।

*

चाँदनी खिलती बालों में

आँखों की चमक सीली सीली सी थी।

तुम अब भी वो ही बच्ची सी लगी

संग तेरे फिर वो दिन मैं भी जी ही ली थी।

कितने ही फ़लसफ़े कहे और सुने

कितने ही क़िस्से बातों में बुने

“बस यही एक पल है गुज़र जाए ना”

सोच ये हर हसरत पूरी सी कर ही ली ।

*

वक़्त बहता चला, कुछ मगर चाल यूँ

दम भर में दिखा. और ओझल हुआ ।

दूर बैठीं हैं जो, पेड़ के नीचे दो

वो सहेलियाँ ही हैं, या परछाइयाँ?

फ़लसफ़े बुन रहीं, उम्र में ढल रहीं

उम्र पकती में और, बचपना भर रहीं,

थपथपा पीठ , कर हौसलों को बुलंद

जैसे कहतीं हो हँस के किसी लम्हे को-

भागते तुम रहे, और डटे हम रहे

लम्हे लम्हे में उमरों को जीते रहें

एक पल ही सही, कोई कम तो नहीं,

फिर मिलेंगे किसी दिन, ये वादा रहा !

फिर एक दिन मिलेंगे

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