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मन बालक बच्चा ही सच्चा –

उम्र ढले निश्छलता ढलती

भक्ति विश्लेषण ना फलती

बालक मन हँस लेता सच्ची

वरना मुस्कानें भी छलती

कौन बड़ा मिलता है सच्चा?

मन बालक बच्चा ही सच्चा ।

!

मन रम जाए जग वो सच्चा-

मन भाए जो हृदय समाए

रंग एकसार हो जाए

मिलकर भी ना रंग मिलें तो

वो भी क्या मिलना कहलाये

!

रंग चढ़े तो रंग हो पक्का ।

मन रम जाए जग वो सच्चा ।।

!

जग का ज्ञानी भी क्या अच्छा-

जो जग जाने कुछ ना माने

रहे प्रश्न प्रत्यंचा ताने

किस उत्तर से जगत विजित कर

मोक्ष के बुन ले बाने-ताने

!

जीवन की कर पहले रक्षा।

जग का ज्ञानी भी क्या अच्छा?

!

कैसे रहे मगर मन बच्चा-

लो मन फिर विश्लेषण करता

कभी डूबता कभी उबरता

मोह-मोक्ष के भाव भँवर में

जीवन सीप से मोती भरता

!

कर्म रण, अभिमन्यु बच्चा ।

कैसे रहे मगर मन बच्चा !!!!

मन बच्चा

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