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मौसम से बेखबर

लहरों पर ठहर ठहर

चलता है शाम-औ-सहर

कश्ती का खामोश सफ़र

ʼ

उसपर मल्लाह करे

नहीं कभी अगर मगर

चाल चले ढीली ज्यूँ

ऊंघती सी दोपहर

.

उड़ा खिल्ली दौड़ चलीं

मछलियाँ चंचल औ चपल

किरण किरण सतह हँसे

सुबह शाम मचल मचल

.

झाँक गहरायी रही

कश्ती बौरायी नहीं

थाह लेती सिहर सिहर

साँस साँस सिमर सिमर

.

कौन चढ़े, उतर चले

कौन रुके, कहाँ फ़िकर

एक साँस नपें सभी

बरस गए बिसर बिसर

.

वहीं थमा लम्हा कोई

ना पाया गुज़र मगर

बढ़ पाए नहीं क़दम

उसी एक सूनी डगर

कश्ती का खामोश सफ़र

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