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क्रोध मनुज पर आता है

बता रहे मुनिवर सारे

होए मनुज कमज़ोर कभी

और यदि वो कभी हारे !

.

हार हुई तो बस मेरी

लाख किए झगड़े सारे

स्वयं से भी और तुम से भी

युद्ध सभी प्रतिदिन हारे,

.

प्रबल समझ के जन जन ने

क्या ना करण मुझ पर डारे

अंतर्मन से निर्बल हो

अस्त्र तज दिए अब सारे

.

क्योकर तुम अंगार बने ?

प्रबल अस्त्र हैं तुम्हारे ।

और क्योकर ख़ूँख़ार हुए-

कौन युद्ध जो तुम हारे ?

.

देखो शीश नवाते हैं

जो ठहरे तुम्हरे द्वारे

हम ही नहीं सब बंधुवर

आज भी समक्ष तुम्हारे

.

सुफल, सफल, सम्पन्न, सुखी

मनके तुमपे हैं न्यारे

तुम पर वारी जगत रीत ने

आशीष की बौछारें

.

मुनिवाणी को झुठलाते

रूद्र रूप क्यूँ हो धारे ?

क्रुद्ध हृदय को करो करूण

प्रबल रहो तुम, हम हारे !

क्रोध

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