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उससे लड़कर लौट चली

ख़ुद से लड़कर जाऊँ कहाँ?

उससे रूठ लिया बेहद

ख़ुद से ख़ुद को छिपाऊँ कहाँ?

.

ना तो उसने कुछ भी कहा

ना ही ख़ुद ने कुछ भी सुना

एकतरफ़े चुप से कैसे

ग़ुस्सा कुचल मैं पाऊँ ज़रा ?

.

इन सुनसान सी राहों में

कितने शोर सताते हैं;

ये जो रोज़ रोज़ उठते,

वो सवाल ले जाऊँ कहाँ?

.

मैं ही केवल ग़लत हुई?

मैं ही क्यूँ कर हार गयी?

वो इतना भी सही नहीं;

कैसे उसे बताऊँ भला??

.

कितने जटिल सन्नाटे हैं

होंठ ना जो मुस्काते हैं

शब्द धधकते जो मन में

किस से कह भी पाऊं भला

.

एक दिन जब थक जाऊंगी

एक दिन जब रुक जाऊंगी

तब भी वो ना पिघलेगा

डर ये कुचल ना पाऊं ज़रा ।

निराश आस

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