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बड़े अजीब से रिवाज हैं 

शहर-ए-मोहब्बत के

कहीं बातों के लहजे से,

कभी शब्दों के तीरों से

कहीं तो दूर दीवारों से

टकरा के लौट आते हुए

भीगे सन्नाटों से

ना जाने कैसी कैसी 

बेपरवाह सर्द रातों से

ये दिल मायूस होता है

अकेले छुप के रोता है

तन्हाई में उदासी 

भीड़ में पर मुस्कुराता है

जानता है ग़लत है, फिर भी

उम्मीदों पे जीता है

चोट जिनसे मिलीं,

उन लमहों को फिर भी संजोता है

लड़कपन तो नहीं लेकिन

निहायत ज़िद् का लेहज़ा है

अक़्ल सोयी नहीं लेकिन

खुदी पे वो पशेमां है

रोज़ फ़रियाद करती है

रोज़ आहें भी भरती है

रोज़ क़समें उठाती है

रोज़ फिर हार जाती है

गुलाबी सर्दियों के छोर पे 

ठहरे कुहासे सा

ठिठक जाता है चलते चलते 

बादल का कोई टुकड़ा

हवा में तैरती जैसे

कोई ख़ुशबू हो छू जाती

यूँ तेरे नाम का एहसास

अनजाने ठहर जाता

रुका रहता कभी कुछ देर

कभी थक के सो जाता

ना जाने कब तलक यूँ ही

रहेगा ये भटकता सा

बाँध लो पास तुम अपने

तोड़ दो सीले ये रिश्ते 

चले जाना है एक दिन दूर 

इन रस्म-ओ-रवायत से

गुज़र जाएँगे हम भी एक दिन 

शहर-ए-मोहब्बत से !!!

शहर-ए-मोहब्बत 

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