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खोल के बैठी आज हूँ पेटी

भरी हुई स्मृतियों की

किसी बात ने याद दिल दी

अनगिनत कड़ियों की

.
चलते चलते नज़र पड़ी 

और मुस्काते था उठाया

रंग ये तुमपे ख़ूब फबेगा

एक ख़याल इतराया

.
उन कपड़ों का कर आलिंगन

सोच सोच मुसकाती

तुम्हें जो दे दूँ क्या बोलोगे 

हँसी रुकी ना जाती

.
और वो नन्ही सी एक डिबिया

जो मन को भायी थी

बड़ा ढूँढ के उसमें रखने

एक इत्र लायी थी

.
जो तुम रोज़ ही थामे रहते

उन किताबों में बसने

चार पंक्तियाँ बड़े यतन 

पत्ते पे लिख पायी थी

.
कभी नाज़ से याद करो तुम

नाम मेरा ले पहनो

शोख़ एक गलबंध मुझही सा

एक उठा लायी थी

.
रंग भी हों कुछ हल्के हल्के

ख़ुशबू भी जो याद सी छलके

कभी लिखो तुम भी कुछ शायद

तूलिका खिसकायी थी

.
और भी जाने कितने सारे

भरे हुए हैं यहाँ ख़ज़ाने

और भी जाने कितने अक्सर

रोज़ उठाती, जोड़े जाती

.
जैसे एक वो रजनीगंधा

चुरा लिया था तुमको देते

यहीं बसा है पन्नों में वो

दो आँखों की चमक समेटे

.
एक रूमाल पे नाम उकेरा

एक चित्र में मन का फेरा

कुछ यूँ हीं सा जाने क्या क्या

बस दे दूँ, मन कितना मेरा

.
और अक्सर ही फ़ुर्सत में फिर

थाम उन्हें यादें सजाती

तुम्हें बिठाती बीच में उनके

हर पल छू के जीती जाती

.
वो चुस्की  भी नहीं हूँ भूली

याद वो मन्नतें  भी

डूब के इन कड़ियों में तैरना

सुख अनंत पर ये ही 

.
सोच रही गर दे दूँ तुमको

कैसे रह पाऊँगी

इनके संग तुमको हूँ जीती

कहाँ तुम्हें पाऊँगी 

.
हो मन में, पर सपने जैसे

बड़े अधूरे लगते

थोड़ा थोड़ा जोड़ रही यूँ 

 तुमको पूरा करते !!

ख़ज़ाना 

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  1. Pingback: ख़ज़ाना | Anutoolika

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