टुकड़ियाँ

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जो शब्-ओ-शाम ही देखा तुम्हे करतें रहतीं
वो निगाहें देखने को तुम्हे पल पल तरसें

हुई मुद्दत ना हुई तुमसे कोई बात, मुलाक़ात
रोज़ ही तुमसे मिलें हैं, रोज़ ही बात करें

भूल तुमको गयें हो ये तो गंवारा ही नहीं
याद करते नहीं गोया की याद तुम भी करो

ख्वाइशें और भी हैं जो ना जुबां बोल सके
बंद आँखें जो करो, फिर मेरी नज़रें पढ़ लो

देखते रहते हैं मुड़के कि जहां तुम थे खड़े
फिर पुकारा करें तुमको याद मर मर के जीये

चले जाता है आज थामे हुए हाथ तेरा
कभी एक वक़्त सुकूं था बसा बस दिल में मेरे

कहे से और भी बढ़ती चली जाती है खलिश
कभी जाना भी हो तो अलविदा ना कहना हमें!

कई दिन की उदासियाँ उम्मीदें कर रहीं रौशन
थकी जातीं थीं नज़रें, शुक्र-ए-रब, दीदार तो होगा !

हमें भूल के तुम रह पाओगे क्या
कि बातों में मेरे फ़साने चलेंगे

लबों पे आज तालें हैं
निगाहें बंद पर्दे में
फिर भी हैं सिलसिले
गुपचुप झाँकने के,गुफ्तगू के

बड़ा गुरूर है खुदपे तुमको
जवाब हर गुरूर का हूँ मैं !!

न देखूं तुमको तो दिन कुछ अधूरा ही सा लगता है
जो देखूं भी, मगर पूरा सा तो होता नहीं लेकिन !

थोड़ी सी ख़ता की इज़ाज़त जो बक्शी है
बेहिसाब नेयमातें इस ख़ता में बसतीं हैं

काश नाराज़गी ही होती इस बेरुखी पे
बात करते नहीं लेकिन, बात करते भी तो हो

हसरतें यूँ भी कभी खेल किया करती है
चाह ये भी कि मयस्सर हो कोई बात करो तुम!

मदहोशियाँ भी, होश भी बहके ना मगर
जाम पे जाम यूँ नज़रों से पिलाओ हमें तुम

क़त्ल होना किसे कहते हैं जाना ये क़त्ल होके
बेबसी के सभी आलम देखते हैं रोज़ जी के

कहीं दीदार की चाहत, कहीं है यार से निसबत
जिधर देखो किसी ताबीज़ से कुछ हसरतें पलतीं !!!!!!

बड़ी बेअदबी से दे डाला तमगा बेसउर का
ये तो कुछ भी नही, हम जाम-ए-जिंदगी पे रखते होठ !

लफ़्ज़ों को बाँध पाये
कब इतनी कुवत हममें
जब भी हुए अकेले
कुछ शब्द बने साथी !

गुज़र रहे थे यूँ ही हम पुरानी राहों से
चंद चेहरे पुराने देख के गुलज़ार हुआ दिल !
इन्ही की सोहबात में कई बदमाशियां सीखी
इन्ही की गालियों में गूंजते  ठहाके गले मिल

जान लेके किसी की जिंदगी पायी जो अगर
जान क्या ख़ाक कभी फक्र से जी पायेगी !

जिसे देखा निगाहें मूँद के, दिल से सुना किया
उनके परदे में होने से भला हमको फरक कैसा !!!!

तमाम बचपन भागते समझ के पीछे रहे
जिंदगी की समझ आई तो बचपन याद आता है

कभी नाराज़ होने की तमन्ना जब भी उठती है
सिहर जाते है कि गर ना मनाया तुमने, क्या होगा !

बड़ा सुकून है आज की इस बेकरारी में
कि अश्क़ भी है, मुस्कराहट भी खुमारी में

बात सबसे किया करते, खफा एक हमसे ही हैं
दोस्ती उनके निभाने का हुनर अच्छा है !

तुमने कब खायी थीं क़समें कोई;
कभी वादे ना किये ।
तुमसे शिकवा ना शिकायत कोई-
हम ही दुनिया में तेरी, बिन इज़ाज़त के जिए!

गुस्सा भी है, गुरूर भी
कुछ आप ले नहीं पाये
कुछ आप ही ने दिया भी !!

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