Monthly Archives: June 2015

दगा

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बड़ा प्यार था तुमसे
जूनून जैसा
तुम्हारी खुशबू
पागल सा करती मुझको
एक बार तो सोचा होता
पीठ पे खंजर घोंपते
कि जिस्म का नहीं
भरोसे की रूह का क़त्ल है
कल से अख़बार में
खबर ताज़ा है-
मत पूछो हाल इस दिल का
टूट ही नहीं,
धड़कना भी भूल सा….
“मेरी वाली maggi”
तो कभी मेरी थी ही नहीं!

क्यूँ

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क्यूँ…

कितनी बातें
कितनी यादें
कितनी गलतियाँ
पूछ पूछ थकें

हर नज़र
हर वक़्त
हर जुबां
एक ही प्रश्न

मीत ने उठाया
मन ने दोहराया
रिश्तों ने सुनाया
पलट पलट आया

ना कोई जवाब
ना कोई बचाव
गहने सा साजये
चेहरे से छुपाएं

और दिन भर के बाद
दुनिया से भाग
जो आइना देखूँ
तो सामने पाऊँ

वो ही एक सवाल
खुद से दोहराते
ना कोई जवाब
फिर भी रहे “क्यूँ” !