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वो राह तो चलते जाना है।

हम एक चले अनजान डगर
तुम एक मिले ना हमसफर
और एक जुड़े, और एक जुड़े
बस राह पे चलते जाना है।

चले इधर उधर हमडगर कभी
कभी प्रीत से बंधते रहे सभी
कभी तकरारें, कभी तलवारें
कैसे भी राह निभाना है।

पाना है क्या- कुछ भी तो नहीं
खोना है क्या-कुछ भी तो नहीं
“कुछ भी तो नहीं” के ऊपर पर
सब कुछ का दाँव लगाना है।

जब आँख खुले, नापे तौले;
जब बैन हिलें, तीखा बोलें
“तुम” को भांपते रहने में
बस ध्येय “स्वयं” को जिताना है।

और राह बढे, और समय चले
और राही पाये स्वप्न नए
और एक जुड़े, और एक जुड़े
उस राह का नहीं ठिकाना है।

बस साँस थकी, अब और नहीं
अब प्राण शेष थोड़े ही सही
ना चाह शेष, फिर भी है कमी
किस राह से मुक्ति पाना है?

ढूंढें हैं सभी के थके नयन
एक तृप्त हँसी, एक गहन शयन
फिर जोड़ रहे मुड़ प्रीत डोर
अब सही डगर को जाना है।

ना रुके कभी, ना झुके कभी
जो सीने चौड़े तने कभी
कुछ देर ठहर, थोडा झुककर
नतमस्तक हो पहचाना है

वो राह तो चलते जाना है ।
वो राह तो चलते जाना है ।

Dedicated to the Landmark forum.
With regards to Ramesh Sir!

राह

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