ताज मेरा तेरा सा…..

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इस किनारे मैं खड़ी;
और तुम रुके थे उस किनारे-
रात आधी, चाँद आधा,
और यमुना की लहर पे
ताज की परछाई छनती;
कह रहीं,
ये ताज मेरा-तेरा सा।
एक कंकड़ ने उछल कर सब मिटाई-
बात भी सब,
और सारी परछाई।
कुछ भी मेरा तेरा क्या?
पर ना जाने क्यों ना माने,
आज भी मन भाग जाता;
चांदनी में भीगते से
ताज को फिर से मनाने,
रूठे लम्हों को बुलाने,
और तुमको भी है पाता:
उस किनारे खोये से कुछ,
ढूंढते कुछ,
कहते कहते;चुप से कुछ कुछ।
बात आधी ही उठी थी,
आँख आधी ही खुली थी,
देखने को था बचा
और कहने को था कितना सब कुछ;
वो अधूरी बातें ही तो खींचतीं हैं,
बाँध के रेशम की डोरी में हमे फिर
और फिर मैं चाँद से ही पूछती हूँ-
कब मिलेगा?
पल वो पूरा-ना रुकेंगे शब्द जब फिर,
चाँदनी में जब दिखेंगीं तेरी नज़रें,
और ना रह जायेगा कुछ अनकहा;
कुछ भी अधूरा…..
आएगा कब पल वो पूरा???

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