अकेला

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राह खूबसूरत सी थी ।
एक लंबी सड़क को घेर सजे
पहाड़ी के हसीं मंज़र-
जो दोनों ओर से
जैसे लिए हों बाहों में;
सहलाते, संवारते उसको ।
ओट में अपनी रखें;
जहां की नज़रों से छिपा,
निहारते उसको।

ये जो पत्थर की टूटी फूटी सी
थी बाड़ बनी;
अपनी बंजर जमीं में भी,
हसीं लगती थी।
नाज़ में उसके लहरा रही राह
जैसे पर्दानशीं हँसती थी।

बहुत कम थी रहगुज़र
मगर जो भी गुज़रा
न बच सका पत्थरों की मोहब्बत से कभी
हरी भरी वादियों तक जाता वो रस्ता
दरक्खतों के बिना
कशिश अज़ीम रखता था।

ना जाने किस मगरूर शायर ने
फेके कुछ बीज
मोहब्बत के उसके बंज़र में
बीज तो होंगे बहुत से लेकिन
कौन पनपेगा उसके बीहड़ में
बिना पानी बिना खाद
बिना प्यार की छाया पाये?

एक मदमस्त ही रहा होगा
तोड़ के रस्मों के बंधन सारे
एक पत्थर के सीने पे लहराता है
वो अकेला है मगर फूल
उस वीराने को महकाता है !

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