Monthly Archives: March 2015

Standard

धुल जातें हैं जाने कितने मलाल
सुलगते मोती में ढलके
रोकतीं लाख जतन कर
दो बेबस अलकें
उफन आते तोड़ सब बाँध
कोमल कोपल पे ढलकें
एक ज्वालामुखी के
विस्फोट सम तपते
क्षणिक उबलते
तनिक पिघलते
फिर स्निग्ध, शांत
सपनों से फलते
शिशिर रूप धरते…

आज आच्छान्दित
कल विस्फोटित
फिर एक कल मुदित
और सुरभित

खिलखिलाहट-रुदन
जैसे जीवन-मरण !

तरन्नुम

Standard

गुनगुनाती है कानों में अक्सर
करे आबाद हर वीराने को
लगें थिरकने मदहोश मंज़र
मेरी लय से कदम मिलाने को
रंग हैं बिखरे आबोहवा पर
मेरी नज़रों का मन लुभाने को
किसी तिलस्म से क्या कंम होगी
छिड़ी तरन्नुम जो तेरे नाम की

अमानतें

Standard

तुम्हारी याद के टुकड़े
बटोरते कई अरसे
भर गया मेरा घरोंदा
जगह कुछ कम सी पड़ती है
कभी समय मिले तुमको
इन्हें ले जाओ अपने संग
कुछ तेरी अमानतें
और कुछ मेरी ख्वाइशें….

मेहँदी

Standard

घंटियाँ की टन्न टन्न किलकारियों सी सुनाई देती है…
हनुमान मंदिर के प्रांगण में आज भी बचपन की मेहँदी की सुगंध है ।

सुप्रभात

Standard

दिनचर्या की भागमभाग
lunchbox की विविधता
बच्चों ने क्या क्या कहा
वेशभूषा की बारीकियां
घड़ी ने दिलाया याद
कामवाली ने फिर नागा किया
उठाते purse चार बार सोचा-
अपना तो सब रख लिया?
कितनी meetings राह देखतीं
कितने रिश्तों को याद किया
चलते चलते मेज़ पर सजी
दवा ने हँस के मुझसे कहा,
सब के बीच मुझे ना भूल
दे रही निरंतर साथ तेरा;
व्यस्तता और रचनात्मकता के बीच
नित्य का मैं तुम्हारा सुप्रभात!

शब्बा खैर !

Standard

रात है गहरा रही; चिराग बुझा दीजिये
ख्वाब हसीं राह तकें, पास बुला लीजिये
नींद की मिठास को ना छू सके नज़र बुरी
धीमे से पलकों के परदे गिरा लीजिये

दिल्ली हाट

Standard

हाट की भीड़ बचा; मुंडेर पे ही बैठा रहा
मन बांवरा रुका वहीँ, साथ में मेरे ना गया

आज भी अक्स तेरा मेरे साथ-साथ जिया
आज फिर एक टुकड़ा याद ने हरा दिया !
.
.
.
.
.
.
.
.
Ttl again!

Accomplishments

Standard

Solitary I sit beholding the sun ….
Set and rise ….free
Through the sands and the magnificent trees
Each moment’s a new tale untold.

The birds, the ants,the flies and creepers
The flowers, the vines, the foliage in nature
Silently accomplish their significant contributions
The jobs unparallel ; no medal they hold

Surrendered to the laws primal
Yet a fight to salute existence
Marvels adorned by each creature
With no pride brilliantly they mould.

Mesmerized my eyes at each revelation
Helplessly compare the man and the nature
Fighting to prove the worthless worth
Inventing, discovering, celebrating the curse
Deed by deed the very roots we sold

The swell of pride, how hollow thine, Man!
Novelty none, while you think you can
Brick by brick laying foundations
The very progress the basis of destruction !