The volcano : in the two cores !

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तोड़ चट्टानें बह जाने को फिर लावा उफनता है 
ठिठकता ना ठुनकता ना , बस अब विद्रोह करता है 
जाने किस पीर की अग्नि छाती धरती की सुलगाती
की अपने ही जाये को भस्म करने को उफान आती
वोह दामन जो बिखेरे फूल, झरने, पाव तले ठौर
बिगड़ जाये ना जाने कब; छीन ले साँसों का भी दौर

वोही ज्वालामुखी एक इस सीने में सुलगता है
वोही लावा का दरिया धडकनों के संग रहता है
ना जाने कैसा बंधन है , अजब अनमोल रिश्ता है
की एक उबलता रहता है और एक शीतल समुन्दर है
एक माने दीवारें सर नवा, जग ने जो दी  उठा
सभी बेडी जो पायल नाम दे  पाव पर दी सजा
और दूजा मचल जाता है मन की बात रखने को 
अपनी ही धुन की करने को अपनी ही राह चलने को…….

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