Deodaar

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सिर उठाये 

आसमान को छूते देओदार
और क़दमों में उनके
सजदा करते
बादलों के नन्हे टुकड़े 
बिखरे
 
उठ उठ बार बार बढ़ते
उनसे कंधा मिलाने
सिर उठाने
फिर फिर फिसल जाते
धरती पे आकर
 
एक नन्हे बालक सा मचलते
उछलते 
अह्ह्ह
क्या मोहक खेल यह
बादलों का पेड़ से
 
और धरती प्रफुल्लित
क्रीडा पे न्योछावर
करती है मोती
अनगिन और अनुपम
फूलों का विस्तृत
मादक यौवन
 
फलित हर डाली
झुकती धरती पर
हँसती और कहती
उठ लो ए बादल
मुझसे भी ऊपर
आगे को बढ़कर
 
वाह अब ना चूके
गर्वित हो बदरी
चढ़ती काँधे से
ऊपर और ऊपर
घन और घनघोर 
सूरज के आगे
छाए अम्बर पर
रैना दिन करदे
 
हँसती फिर धरती
झूमे है पल्लव
की अब थक कर जब
बदरी  उतरेगी
बूंदे बरसाती
जग को नहलाती
सोंधी  खुशबू से 
सब को महकाती
 
फिर ढल जायेगी
कांधे से नीचे
फिर लहराएगी
कदमो पे आके
 
पर वो क्षणभंगुर 
विजयी सिंघसान
ही तो है उद्गम
जीवन में जल का
 
फिर देओदार 
सिर को उठाये
अवनी से सिंचित
अम्बर पे छाए
 
अपने आँचल में
बदरी झुलाते
फिर नन्हे टुकड़े 
गोदी खिलाते

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